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श्रीनगर में सिर्फ़ उत्साह नहीं, चिंता भी है | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कश्मीर को मैंने कई बार देखा था, अनगिनत बार चित्रों में और एकाध बार सपने में भी लेकिन श्रीनगर पहुँचा तो कश्मीर को एकदम अलग पाया. पत्रकार होने के नाते ज़मीनी हक़ीकत से मैं वाकिफ़ था लेकिन अहसास अक्सर सदमों से नहीं बचाते. हवाई अड्डे से निकलते ही श्रीनगर की सूनी सड़कें थीं और सुरक्षा का भयावह सा आवरण. दुकानों को शटर गिरे हुए थे और उन पर ताले लटक रहे थे. सड़कें सूनी-सूनी सी थीं, सेना तथा सुरक्षाबलों के जवान तैनात थे. उनकी संख्या कितनी होगी यह अनुमान लगाना तो कठिन था लेकिन सामान्य रफ़्तार से चलती अपनी कार से बाहर की ओर देखते हुए मैं एक बार पलक झपकता तो सामने दूसरा जवान दिखाई देता था. हालांकि यह जानकर थोड़ी सी राहत मिली कि दुकानों के शटर व्यापारियों ने ख़ुद गिरा रखे हैं वैट के विरोध में और रविवार को फ़ुटपाथ पर लगने वाला बाज़ार अभी भी लग रहा है. बस उत्सव दिन भर लोगों से बात करते हुए कई तथ्यों से सामना हुआ. जिस श्रीनगर-मुज़फ़्फ़राबाद बस सेवा को लेकर पूरा भारत उत्साहित दिखाई दे रहा है उसे लेकर जम्मू कश्मीर में सिर्फ़ उत्साह नहीं है, चिंता भी है. सबसे बड़ी चिंता सुरक्षा की है. अलगाववादी गुटों की धमकियों के बाद पहली बस से मुज़फ़्फ़राबाद जाने वाले लोगों के उत्साह पर पानी सा फेर दिया है. यह बताने के लिए कि उनकी धमकी सिर्फ़ धमकी नहीं है अलगाववादियों ने पहली बस से यात्रा करने वाले यात्रियों की सूची सभी मीडिया कार्यालयों में फ़ैक्स कर दी. जब सरकार के अधिकारियों को सूची का पता नहीं था हर मीडियाकर्मी के हाथ में सूची की एक प्रति थी. पते और फ़ोन नंबर सहित. जो लोग बरसों बाद अपने प्रियजनों से मिलने को लेकर अपनी ख़ुशी छिपा नहीं पा रहे थे अब ख़ुद ही छिपे-छिपे फ़िर रहे हैं. कुछ ने बस यात्रियों की सूची से अपना नाम वापस ले लिया है तो बाक़ी लोगों को प्रशासन ने एक सरकारी गेस्ट हाउस (टूरिस्ट रिसेप्शन सेंटर) में लाकर रख दिया है. एक तरह से नज़रबंद. उनसे न कोई मिल सकता है और न वे किसी से मिल पा रहे हैं. सात अप्रैल को बस में रवाना होने तक वे इसी तरह सरकार के ‘मेहमान’ रहेंगे. इस सवाल का जवाब इस वक्त कोई देने को तैयार नहीं है कि बस में लोग जाएँगे और वापस आएँगे लेकिन इस यात्रा के बाद उनकी सुरक्षा कौन करेगा. आलाअफ़सरों और राजनेताओं के पास इस सवाल का जवाब देने का वक़्त नहीं है क्योंकि वे उत्सव की तैयारियों में लगे हैं और उनकी प्राथमिकता उत्सव को निर्विघ्न पूरा करना है. |
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