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बीबीसी समाचार यानी पत्थर की तेज़ धार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी का कारवाँ अपने अगले पड़ाव के लिए बुधवार को झारखंड की राजधानी, राँची पहुँचा. राँची के एक होटल की छत, पीछे क्षितिज रेखा और शाम का धुँधलका और ऐसे में ढेर सारे श्रोताओं की उपस्थिति, कुछ इस तरह शुरू हुई बीबीसी के श्रोताओं से बातचीत. इतने सारे श्रोताओं में सभी से बात कर पाना तो मुम्किन नहीं था पर कुछ लोगों से बातचीत की और ऐसे ही एक श्रोता, हुसैन कच्छी ने बताया,"मैं लंबे समय से और तमाम बदलते हालातों के बावजूद बीबीसी ज़रूर सुनता हूँ और यह मेरे शौक़ में शामिल है." पर बीबीसी ही क्यों, पूछने पर वो बताते हैं, "मेरा मानना है कि जो राज्य नियंत्रित माहौल है, उसके मुक़ाबले में बीबीसी एक आज़ाद राय और ख़बरें देता है." वो बताते हैं कि बीबीसी को सुनते हैं तो ऐसा लगता है कि किसी आज़ाद आवाज़ को सुन रहे हैं. हमने पूछा, “हुसैन साहब, भारत में तो इस समय तमाम ऐसे समाचार चैनल हैं, जिनपर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं. फिर 24 घंटे समाचार सुनने के विकल्पों के होते हुए भी रेडियो और ख़ासकर बीबीसी सुनना क्या कुछ मायने रखता है.” यक़ीनन, हुसैन कहते हैं, “क्योंकि जो लोग इसमें काम कर रहे हैं, उन्होंने काफ़ी मेहनत करके यह मुक़ाम हासिल किया है और उनकी यह कोशिश रहती है कि इतनी दूर बैठकर भी लोगों तक उनकी आवाज़ आसानी से पहुँचे.” एक अन्य श्रोता, महेंद्र प्रसाद ने तो बीबीसी की तारीफ़ों के पुल ही बाँध दिए.
महेंद्र प्रसाद, पेशे से शिक्षक हैं और झारखंड नेत्रहीन संघ के अध्यक्ष भी. पर तारीफ़ों के बाद जब उनसे पूछा कि बीबीसी से उनकी क्या अपेक्षाएँ हैं तो उन्होंने बताया,"नेत्रहीन और विकलाँग लोग समाज का सबसे पिछड़ा और उपेक्षित वर्ग हैं. बीबीसी को चाहिए कि वो इन लोगों की असली स्थिति को लोगों के सामने लाए." चर्चा के दौरान पुरुष तो पर्याप्त थे पर महिलाएँ केवल तीन ही थीं. इनमें से एक महिला श्रोता, दलिंदा सोरेन ने बताया, "ऐसा नहीं है कि चर्चा के दौरान महिलाएँ कम हैं. मैं अपना नहीं, झारखंड की उन तमाम महिलाओं का प्रतिनिधित्व कर रही हूँ जो अपने घरों, खदानों या क्रेसरों में काम कर रही हैं." और फिर दलिंदा सोरेन ने अपनी क्षेत्रीय शैली में हमसे जोहार कर हमारा स्वागत भी किया. जुहार हुई तो बात आगे बढ़ी. दलिंदा सोरेन ने बताया, "हमारे सामने समाचार सुनने के तमाम विकल्प हैं पर सुबह-सुबह बीबीसी के प्रसारण को सुनने के बाद लगता है कि पत्थर की धार पर अपना दिमाग़ तेज़ करके आ रहे हैं." और कुछ इस तरह चर्चा अपने अंतिम छोर पर पहुँची. हमने भी लोगों से विदा लेते वक्त कहा- जोहार. |
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