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'...यहाँ डिग्री पाएँ, रोज़ग़ार नहीं' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
'मैं अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल मगर, लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया.' सूचना के व्यस्त सुपर हाइवे, टेलीविज़न एंटिना और सैटेलाइट डिशों से ढके शहरी क्षितिज पर रेडियो कितना ताक़तवर है इसकी पुष्टि पिछले एक हफ़्ते में फिर हुई. एक हफ़्ता, कभी समतल तो कभी ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होता हुआ सुपरसॉनिक गति से बीत गया. गोंडा, फ़ैज़ाबाद, अकबरपुर, सुल्तानपुर और प्रतापगढ़ से होता हुआ हमारा कारवाँ संगम स्थली इलाहाबाद पहुँचा. इलाहाबाद, जहाँ कभी साहित्य की गंगा-जमुना बहती थी. कितने ही बड़े-बड़े नाम हैं जो इलाहाबाद से जुड़े हैं. इलाहाबाद कुछ की जन्मभूमि रही, कुछ की कर्मभूमि. महादेवी वर्मा, धर्मवीर भारती, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, फ़िराक गोरखपुरी और अकबर इलाहाबादी. चूँकि मेरी ये पहली इलाहाबाद यात्रा थी इसलिए देखना तो बहुत कुछ चाहती थी मगर जिस तरह बीबीसी के श्रोताओं से मुलाक़ात छोटी सी लगी उसी तरह इलाहाबाद से परिचय भी अधूरा सा लगा. आज़ादी की लड़ाई का केंद्र रहा 'आनंद भवन' और 'सीनेट हॉल' जहाँ 'पूरब पश्चिम' फ़िल्म की शूटिंग हुई थी, बस बाहर से ही देख पाई. और जो चीज़ कहीं दूर-दूर तक नज़र नहीं आई वो थे इलाहाबाद के अमरूद. ग़लती अमरूदों की नहीं, हम ही बेमौसम के मेहमान थे. बहरहाल 'पूर्व का ऑक्सफ़ोर्ड' कहलाने वाला इलाहाबाद विश्वविद्यालय देखा तो याद आया कि भारत के कुछ प्रधानमंत्री भी यहाँ शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं. सोचा, जब वे छात्र रहे होंगे तो युवा आँखें क्या सपने देखती होंगी? क्या तभी से राजनीति के अखाड़े में उतरने, चुनाव लड़ने और देश चलाने की इच्छा रही होगी? कैसे भारत की परिकल्पना की होगी उन्होंने? क्या ऐसा जैसा वो है? "तो बुरा क्या है मैडम", किसी ने कहा. "कुछ दिन पहले तक हम 'मेरा भारत महान' का जाप करते थे तो अब 'शाइनिंग इंडिया' का नारा लगाते हैं." अच्छी बात है, तो फिर सीने में जलन और आँखों में तूफ़ान सा क्यों है. ख़ासकर युवाओं की आँखों में. भविष्य के नाम पर अब भी हर दूसरा युवक सिविल सेवाओं की तैयारी करता क्यों दिखाई देता है. जवाब आया, "बेरोज़ग़ारी के दौर में बिना वेतन का रोज़ग़ार है ये." इलाहाबाद ही क्यों, हम जहाँ भी गए, आँखों में 'भविष्य के सवालों का काजल' लिए युवाओं का तूफ़ान सा उमड़ आया. काजल बहकर होंठों पर आया. "शिक्षा की सुविधाएँ बेहतर होनी चाहिए." "शिक्षा को रोज़ग़ार से जोड़ने की ज़रूरत है." "इसके लिए तकनीकी शिक्षा की आवश्यकता है." 'रोज़ग़ार के अवसर ज़्यादा हों तो भारत महान भी हो सकता है और शाइन भी कर सकता है.' इस नए भारत में महानगरों से दूर के इस नए युवा वर्ग के लिए 'फ़ील गुड' का यही सच्चा अर्थ है. फ़िलहाल उसे लग रहा है कि उसके जीवन की गंगा के किनारे यही संदेश लिखा है 'यहाँ डिग्री पाएँ, रोज़ग़ार नहीं.' मुझे संगम के किनारे पर्यावरण की रक्षा के लिए लिखा संदेश याद आया 'गंगा में पाप धोएँ, गंदगी नहीं.' और याद आया - फ़िराक गोरखपुरी का एक शेर, "हर लिया है किसी ने सीता को, ज़िंदग़ी है कि राम का वनवास." रोज़ग़ार के बाज़ार में अपनी डिग्री लिए बहुत से युवक मुझे 'राम की तरह वनवासी' लगे. |
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