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नेपाल में नेताओं की नज़रबंदी बढ़ी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल में अधिकारियों ने कहा है कि दो पूर्व प्रधानमंत्रियों सहित कम से कम पाँच नेताओं की नज़रबंदी की अवधि बढ़ा दी गई है. इन नेताओं को तभी से उनके घरों में ही नज़रबंद किया हुआ है जब नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र ने फ़रवरी में सरकार को बर्ख़ास्त करके सत्ता अपने हाथों में ले ली थी और आपातस्थिति लगा दी थी. अब सरकार ने कहा है कि इन नेताओं की नज़रबंदी की अवधि दो महीने के लिए बढ़ाई गई है. राजनीतिक दल देश में लोकतंत्र की बहाली के लिए राजधानी काठमाँडू में प्रदर्शन करने की योजना बना रहे थे, प्रदर्शनों से पहले ही सरकार ने इन नेताओं की नज़रबंदी की अवधि बढ़ा दी है. जिन नेताओं की नज़रबंदी की अवधि बढ़ाई गई है उनमें पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजि प्रसाद कोईराला और शेर बहादुर देऊबा शामिल हैं. अन्य नेता हैं - संयुक्त मार्क्सवादी लेनिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी के माधव नेपाल और पूर्व मंत्री भारत मोहन अधिकारो और पूना बहादुर खडका. ख़त्म होने से पहले कुछ सरकारी अधिकारियों ने पहचान गुप्त रखने की शर्त पर समाचार एजेंसी एपी को बताया कि इन नेताओं की नज़रबंदी इस सप्ताह समाप्त होने वाली थी.
एक अन्य समाचार एजेंसी एएफ़पी ने एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी बामन प्रसाद न्यूपेन के हवाले से कहा है, "पहले इन नेताओं को सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के तहत एक महीने के लिए घरों में नज़रबंद किया गया था." "अब एक महीना पूरा होने के बाद यह समझा गया कि उनकी नज़रबंदी तुरंत समाप्त नहीं की जा सकती इसलिए उसे दो महीने के लिए बढ़ाया गया है." बामन प्रसाद न्यूपेन ने बताया कि नज़रबंद किए गए सभी नेता सही - सलामत और स्वस्थ हैं और उन्हें अपने घर के अंदर ही रहते हुए सबकुछ करने की इजाज़त है. न्यूपेन ने यह भी बताया कि इन नेताओं को किसी आगंतुकों से मिलने की इजाज़त नहीं है. नेपाल के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के एक सदस्य सुशील प्याकुरेल ने कहा कि इन नेताओं की टेलीफ़ोन लाइनें काटी हुई हैं और उन्हें सिर्फ़ सरकारी अख़बार ही मिलते हैं. नरेश ज्ञानेंद्र का कहना है कि उन्होंने सरकार को बर्ख़ास्त करके आपातस्थिति इसलिए लगाई क्योंकि चुनी हुई सरकार माओवादी विद्रोहियों की समस्या का कोई हल नहीं निकाल सकी. ग़ौरतलब है कि नेपाल में माओवादी विद्रोहियों और सरकार के बीच क़रीब दस साल पहले शुरू हुए संघर्ष में लगभग 11 हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है. |
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