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माओवादियों ने अभियान वापस लिया | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल में माओवादियों ने यातायात व्यवस्था ठप करने का अपना अनिश्चिकालीन और देशव्यापी अभियान वापस लेने की घोषणा की है. माओवादी नेता प्रचंड के हस्ताक्षर वाले एक बयान में कहा गया है कि अभियान जनता के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी प्रदर्शित करने के लिए वापस लिया जा रहा है. माओवादियों ने यातायात अवरुद्ध करने का अपना अभियान 14 दिन पहले 12 फरवरी को अपने आंदोलन की नौवीं वर्षगाँठ पर शुरू किया था. फरवरी के शुरू में ही नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र ने शेर बहादुर देउबा की सरकार को बर्ख़ास्त करते हुए देश में आपातकाल लगा दिया था और सारे कार्यकारी अधिकार अपने हाथ में ले लिए थे. माओवादियों ने भी नेपाल नरेश के इस क़दम का विरोध किया था और अपना आंदोलन तेज़ करने की घोषणा की थी. माओवादियों की यातायात अवरुद्ध करने की घोषणा के कारण राजधानी काठमांडू से आने और जाने की परिवहन व्यवस्था पर बड़ा असर पड़ा था. रिहाई शुक्रवार को ही आपातकाल लागू होने के बाद गिरफ़्तार दो पूर्व मंत्रियों समेत छह लोग रिहा कर दिया गया था. शेर बहादुर देउबा सरकार में मंत्री रहे होमनाथ दहल और एक अन्य पूर्व मंत्री और यूनाइटेड मार्क्सवादी लेनिनवादी के प्रदीप नेपाल के साथ-साथ नेपाली पत्रकार संघ के महासचिव बिष्णु निष्ठुरी को भी रिहा कर दिया गया. इनके अलावा भारत में नेपाल के पूर्व राजदूत लोकराज बराल, प्रोफ़ेसर खगेंद्र भट्टाराई और पूर्व सांसद शिव कुमार बसनेत को भी रिहा किया गया. पिछले सप्ताह भी नेपाल में कई लोगों को रिहा किया गया था लेकिन अभी भी कई शीर्ष नेता, पार्टी कार्यकर्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता हिरासत में हैं. इनमें बर्ख़ास्त प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा, नेपाली कांग्रेस के गिरिजा प्रसाद कोईराला और यूएमएल के माधव कुमार नेपाल भी शामिल हैं. नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र का कहना है कि कार्यकारी अधिकार अपने हाथ में ले लेने का फ़ैसला, सरकार को बर्ख़ास्त करने का फ़ैसला और आपात काल लागू करना देश में शांति व्यवस्था और माओवादी विद्रोह से निपटने के लिए ज़रूरी था. |
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