|
छत्तीसगढ़ के निजी विश्वविद्यालय ख़त्म | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ राज्य के लगभग एक सौ निजी विश्वविद्यालयों को बंद करने का आदेश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने यह फ़ैसला एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान किया है जिसमें कहा गया था कि इन विश्वविद्यालयों की स्थापना मनमाने ढंग से की गई और स्तर का कोई ध्यान नहीं रखा गया. यह याचिका शिक्षाविद प्रोफ़ेसर यशपाल, सामाजिक कार्यकर्ता सुदीप श्रीवास्तव और कुछ अन्य लोगों ने दायर की थी. छत्तीसगढ़ के शिक्षा मंत्री के अनुसार इन विश्वविद्यालयों में लगभग पाँच हज़ार छात्र पढ़ रहे हैं. उनका कहना है कि राज्य सरकार छात्रों के भविष्य का पूरा ख़याल रखेगी. फ़ैसला याचिकाकर्ताओं में से एक गोपाल अग्रवाल के वकील डीके गर्ग के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के निजी विश्वविद्यालय अधिनियम की धारा पाँच और छह को रद्द कर दिया है.
उन्होंने बताया कि इन धाराओं के तहत राज्य सरकार को यह अधिकार था कि वे चाहे जितने निजी विश्वविद्यालय स्थापित कर सकती है. डीके गर्ग ने बताया कि इस आदेश में कहा गया है कि इस अधिनियम के तहत स्थापित सभी विश्वविद्यालयों का अस्तित्व अब असंवैधानिक होगा. इस आदेश में कहा गया है कि विश्वविद्यालयों ने जो शिक्षण संस्थान स्थापित किए हैं अगर उनका स्तर ठीक है तो उनको राज्य के दूसरे विश्वविद्यालयों से संबद्ध कर दिया जाए. उनके अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों के बारे में कुछ नहीं कहा है. प्रकिया ग़लत याचिकाकर्ता सुदीप श्रीवास्तव ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि विश्वविद्यालयों की स्थापना के विधायिका के अधिकार को जिस तरह छत्तीसगढ़ में कार्यपालिका के हवाले किया गया वह आपत्तिजनक था. उनका कहना है कि शिक्षा के क्षेत्र में निजी पूंजी के निवेश से पहले देश में इस बात पर बहस होनी चाहिए कि किन क्षेत्रों की शिक्षा के लिए निजी पूँजी की ज़रुरत है. वे मानते हैं कि कुछ छात्रों का भविष्य अधर में लटक जाएगा लेकिन वे कहते हैं कि अधकचरा डिग्रीधारी नवयुवक तैयार करने से अच्छा है कि उन्हें अभी निराश कर लिया जाए. सरकार की प्रतिक्रिया जब अजित जोगी सरकार ने इन विश्वविद्यालयों की स्थापना की थी तब विपक्ष में बैठी भाजपा ने इसका विरोध किया था. लेकिन सरकार में आने के बाद भाजपा ने इन विश्वविद्यालयों को लेकर बने अधिनियम में कुछ संशोधन कर दिए. इसके तहत शहर में बनने वाले सभी विश्वविद्यालयों के लिए दो करोड़ रुपयों की अमानत राशि जमा करना और 15 एकड़ ज़मीन लेना आवश्यक कर दिया. आदिवासी क्षेत्रों के लिए अमानत राशि एक करोड़ थी और ज़मीन की सीमा 25 एकड़ थी. छत्तीसगढ़ के शिक्षा मंत्री अजय चंद्राकर ने बीबीसी से हुई बातचीत में कहा, "राज्य सरकार के इस निर्णय से निजी विश्वविद्यालयों की संख्या घटकर सिर्फ़ 37 रह गई थी जिसमें से केवल 17 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पास मान्यता के लिए भेजा गया था." उनका कहना था कि हालांकि उन्होंने अभी सुप्रीम कोर्ट का निर्णय देखा नहीं है लेकिन राज्य सरकार की ओर से यह आश्वासन देना चाहते हैं कि छात्रों का भविष्य नष्ट नहीं होने दिया जाएगा. उन्होंने बताया कि इस समय इन विश्वविद्यालयों में पाँच हज़ार छात्र पढ़ रहे हैं. इस सवाल पर कि क्या इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ राज्य सरकार अपील करेगी, उन्होने कहा कि राज्य के वकील इस फ़ैसले का अध्ययन कर रहे हैं उसके बाद ही कोई निर्णय लिया जाएगा. विवादित मामला निजी विश्वविद्यालय खोलने का फ़ैसला नए राज्य छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी की सरकार ने किया था. उस समय सरकार को 125 के क़रीब आवेदन मिले थे जिनमें से सरकार ने 97 को अनुमति दे दी थी. बाबा मस्तनाथ, लवली, लॉर्ड्स, जयपुरिया और दून विश्वविद्यालय से लेकर वेस्टर्न इंडिया जैसे नामों वाले इन विश्वविद्यालयों में से अधिकांश एक-दो कमरों में चल रहे थे. इन विश्वविद्यालयों की स्थापना करने वाले राज्य के तत्कालीन शिक्षा मंत्री सत्यनारायण शर्मा का कहना था कि सरकार शिक्षा के क्षेत्र में भी खुली प्रतिस्पर्धा चाहती थी.
इतनी बड़ी संख्या में विश्वविद्यालयों की स्थापना पर कहा, "हमारा मानना था कि जो सर्वश्रेष्ठ होंगे वे बच जाएँगे और जो चलने के लायक नहीं होंगे वे ख़ुद ही बंद हो जाएँगे." उन्होंने यह मानने से इंकार किया कि जोगी सरकार ने छात्रों के भविष्य के साथ कोई खिलवाड़ किया लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर उन्होंने कहा कि इसके बाद उन्हें भी छात्रों की चिंता है. उन्होने एक सवाल के जवाब में कहा कि वे नहीं मानते कि जोगी सरकार से कोई ग़लती हुई. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||