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आपातकाल के दौरान ख़बरें जुटाने की चुनौती | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल में ये एक सप्ताह मेरे लिए बिल्कुल अलग ही अनुभव था. इससे पहले भी कई बार कठिन हालात में मैने काम किया था, लेकिन प्रेस सेंसरशिप का क्या मतलब होता है, इसका अनुभव मुझे इसी यात्रा में हुआ. मैं और रेहान फ़ज़ल एकसाथ थे. हमारे लिए पहला झटका था जब हमने कुछ लोगों को फोन पर संपर्क करने की कोशिश की. सभी फोन लाइनें ठप्प थीं. टीवी चैनलों पर राजा ज्ञानेन्द्र की शाही घोषणा के अलावा कुछ नहीं था, ये चैनल भी अगले दिन ग़ायब हो गए. सड़कों पर सब कुछ सामान्य नज़र आ रहा था सिवाए भारी संख्या में हथियार बंद सैनिकों की उपस्थिति के. हालात लेकिन जब हमने लोगों से बात करने की कोशिश की तो हमें समझ आ गया की जो देखने में सामान्य है स्थिति उससे अलग है. ज़्यादातर लोगों ने तो हमसे बात ही नहीं की, कुछ ने की तो खुल कर नहीं बोले. एक आदमी ने अपनी दोनों कलाई मिलाकर कुछ इशारा किया और फिर होठों पर उंगली रखी. मतलब साफ़ था अगर कुछ बोला तो हथकड़ी लग जाएगी. समाचार पत्र पूरी तरह से राजा ज्ञानेन्द्र सिंह के प्रशंसा-पत्र बने थे. अख़बारों में कुछ भी ऐसा नहीं था जिसे आप समाचार कह सकें. आख़िरकार हमने अपने टैक्सी ड्राईवर से नेताओं के घर चलने को कहा. सबसे पहले हम पहुँचे नेपाल की कम्यूनिस्ट पार्टी यूएमएल के नेता माधव नेपाल के निवास पर. उनके निवास से कोई सौ मीटर पहले ही सादे कपड़ों में खड़े सुरक्षाकर्मियों में हमें रोक लिया, हमने उनसे पूछा की उनका घर कम से कम हमें दिखा दें. वो हमें घर के पास तक ले गए. चप्पे-चप्पे में सैनिक मौजूद थे. अब हमें समझ आ चुका था कि हमारा काम कितना मुश्किल होने वाला है. दोपहर होते होते साफ़ हो गया कि नेपाल में चोटी के सभी नेता गिरफ़्तार हो चुके हैं.
स्थिति को और समझने के लिए हमने समाचार पत्रों के दफ़्तरों का चक्कर लगाने का फ़ैसला किया. लेकिन जब अख़बारों के दफ़्तर पहुँचे तो यहाँ बड़ी तादाद में सैनिक मौजूद थे. आख़िरकार हम हिमाल पत्रिका के दफ़्तर पहुँचे, यहाँ अभी सैनिक नहीं आए थे, कुछ स्टाफ भी मौजूद था. चूंकि ये पाक्षिक पत्रिका है शायद इसलिए यहाँ अभी कुछ ढील थी. यहाँ से हमें पता चला की समाचार पत्रों का प्रकाशन पूरी तरह से शाही सेना के हाथों में चला गया है. सब चुप रह-रहकर एक सवाल हमें परेशान कर रहा था कि इतना कुछ हो गया, फिर भी कोई आवाज़ क्यों नहीं उठ रही है. मैं और रेहान त्रिभुवन विश्वविद्यालय पहुंचे. यहाँ भी भारी तादाद में सैनिक मौजूद थे. यहाँ के राजनीति शास्त्र के विभाग में पहुँचे तो एकदम सन्नाटा था. घूमते-घूमते हम हॉस्टल पहुँच गए. यहाँ कुछ हलचल हो रही थी. कुछ ऐसी आवाज़ें आ रही थीं जैसे कोई तेज़ी से आरी चला रहा हो. हम उधर ही बढ़े, देखा की कुछ लड़के जंगले के छड़ें काट रहे हैं. हम पर नज़र पड़ते ही वो भागने लगे. हमने उन्हें चिल्लाकर बताया कि हम बीबीसी से हैं, तो वो रुके और हमारे पास आए, देखते-देखते लगभग सौ से ज़्यादा छात्र हमारे आसपास जमा हो गए.
उनमें राजा के फ़ैसले के ख़िलाफ काफ़ी ग़ुस्सा था. उन्हें ख़तरा था कि उन्हें गिरफ़्तार किया जा सकता है, इसलिए वो अपने भागने का रास्ता बना रहे हैं. ये छात्र गुस्से में थे लेकिन उन्हें ये समझ नहीं आ रहा था कि विरोध कैसे प्रकट करें. उन्हें अभी ये नहीं पता था कि उनके संगठनों के सभी बड़े नेता गिरफ़्तार किए जा चुके हैं. शाम होते-होते हम होटल पहुँचे. दिन भर के बाद बताने के लिए हमारे पास बहुत कुछ था. हालांकि हमें ये विश्वास नहीं था कि ये ख़बर हम अपने पाठकों और श्रोताओं तक पहुँचा पाएंगे. किसी भी समय हमारे उपकरण ज़ब्त होने और स्वयं को गिरफ्तार होने की आशंका बनी हुई थी. ख़ैर हम अपने कमरे में पहुँचे और सैटेलाइट फोन लगाया. नेपाल में वर्तमान सरकार की सख़्ती हमें समझ आ चुकी थी. लेकिन साथ ही हम ये नहीं मान रहे थे कि ऐसे समय में देश में प्रजातंत्र चाहने वाले खामोश बैठे होंगे. संदेशा आया फिर हमने फ़ैसला लिया और नीचे उतर आए. होटल की लाँबी में हमें एक आदमी कुछ तलाशता सा नज़र आया, लेकिन वो रिसप्शन पर नहीं आ रहा था. कुछ सोच विचार कर हम उसके नज़दीक गए और थोड़ी ऊँची आवाज़ में अपने समाचारों और बीबीसी की बातें कीं तो उसने धीरे से पूछा आप पत्रकार हैं. हमने उसे धीरे से कहा, "503". ये हमारा कमरा नंबर था. हमारे पहुँचने के कुछ मिनट बाद वो हमारे कमरे पहुँचा.
वो नेपाल कांग्रेस का कार्यकर्ता था. फिर वो हमें एक जगह ले गया और हमें एक टेप दिया. इस टेप में नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री जी.पी. कोइराला का संदेश था. जो उस समय नजरबंद थे. हमने इसकी पुष्टि करने को कहा, वहाँ से वो हमें जहाँ ले गया, हमारा संदेह पूरी तरह मिट गया. इस टेप के प्रसारण की देर थी कि बीबीसी हिन्दी और हम चर्चा में आ गए. धीरे-धीरे लगभग हर पार्टी के नज़रबंद नेता से हम संपर्क साधने में सफल रहे. हम वहाँ भूमिगत नेताओं कार्यकर्ताओं में 503 के नाम से जाने जाते थे. इसका मतलब था बीबीसी हिन्दी टीम का कमरा नंबर 503. निगरानी में लेकिन चौथे दिन हमे संकेत मिलने लगे कि अब काठमांडू में ज़्यादा दिन हम नहीं रह पाएंगे. हमारे होटल के कमरे से निकलने से लेकर लौटने तक कम से कम चार आँखे हम पर लगी रहती थीं. पाँचवें दिन हमारे कमरे का टीवी केबल बंद कर दिया गया और छठे दिन कार्यक्रम शुरू होने से तुरंत पहले हमारे कमरे की बिजली बंद कर दी गई. अब हमारे सामने लौट आने के अलावा एक ही विकल्प था कि हम शाही सेना के मेहमान बन जाएँ यानी कि गिरफ़्तार कर लिए जाएं. कुछ पत्रकारों के जरिए हमें ये चेतावनी पहुँचा दी गई थी. हमने पहला विकल्प चुना, गिरफ़्तार हो जाते तो शायद ये कहानी अभी आपको नहीं बता पाते. |
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