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शनिवार, 05 फ़रवरी, 2005 को 03:15 GMT तक के समाचार
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नेपाल में अख़बारों का हाल

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नेपाल की सड़कों पर लोग कम और सैनिक ज्यादा दिखते हैं
मोज़े पैरों को कैसे गर्म रखते हैं. ये शीर्षक था शुक्रवार को काठमांडू पोस्ट के संपादकीय का जो दिखाता है कि जब किसी देश में सेंसरशिप लागू हो तो क्या होता है.

शुक्रवार की सुबह जब मैं सोकर उठा तो होटल के कमरे में रखे टेलीविज़न ने भी बात करने से इंकार कर दिया. एक दिन पहले तक जो समाचार चैनल दिख रहे थे वो भी बंद किए जा चुके थे.

भारतीय समाचार चैनलों पर प्रतिबंध तो पहले दिन ही लगा दिया गया था. शुक्रवार को संगीत चैनल भी बंद कर दिए गए. सारे चैनल घुमा घुमा कर थक गया लेकिन कुछ भी देख नहीं सका.

टेलीफोन लाइनें तो बंद थी हीं.

थक हार कर काठमांडू पोस्ट पढ़ने लगा.

नेपाल में अंग्रेज़ी के सबसे प्रतिष्ठित अख़बार में संपादकीय लिखा गया था मोजे पैरों को कैसे गर्म रखते हैं.

संपादकीय शुरु होता है कुछ इस तरह. मोज़े और समाज.

समाज मोज़ों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता. ये पैरों को गर्म रखते हैं.

पूरा अख़बार ऐसे ही ख़बरों से भरा है. कुछ ख़बरें और भी हैं.

सेना के प्रवक्ता दीपक गुरंग के हवाले से कहा गया है कि राजनीतिक नेताओं को इस शर्त पर छोड़ा जा सकता है कि वे सुरक्षा के लिए खतरा न बनें.

अख़बार में बुधवार को नरेश ज्ञानेंद्र की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में लिए गए फैसलों का भी उल्लेख है.

उधर फोन लाइनें शुरु नहीं हुई है. गुरुवार को दो घंटे के लिए फोन चालू हुए थे और फिर काट दिए गए.

कहा जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के तहत बाध्यता के कारण दो घंटे के लिए फोन लाइनें शुरु की जाती हैं.

संचार सचिव सुगथ रथ कंसरक का कहना है कि फोन लाइनें शुरु करने के लिए वो सरकार के निर्देश का इंतज़ार कर रहे हैं.

इधर काठमांडू में हम लोगों से मिल रहे हैं लेकिन कोई भी साफ साफ कुछ कहने से डर रहा है.

एक और अनोखी बात देखने को मिली. काठमांडू मे रात भर में ही राजतंत्र विरोधी नारे लिखे जाते हैं दीवारों पर.

सुबह इन नारों को पढ़ा जा सकता है लेकिन दिन निकलते ही पुलिसवाले इन्हें साफ करने के काम में लग जाते हैं.

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