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अंडमान के लापता लोगों की तलाश | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के अंडमान निकोबार में सूनामी के बाद लापता हुए लोगों की तलाश अब भी जारी है. कच्छल टापू से ही लगभग साढ़े चार हज़ार लोग लापता हैं, माना जा रहा है कि इन लोगों को लहरें अपने साथ बहाकर समुद्र में ले गई होंगी. अंडमान निकोबार में मरने और लापता होने वाले लोगों की कुल संख्या सात हज़ार से अधिक हो गई है. जो लोग लापता हैं उन्हें अब मृत मान लिया गया है क्योंकि इतने दिनों बाद लोगों के जीवित बचने की संभावना नहीं दिख रही है.
कच्छल टापू की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी आदिम जनजातियों की है और माना जा रहा है निकोबारी कबीले के लोग सबसे बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. अंडमान निकोबार में सेना के सबसे बड़े अधिकारी लेफ़्टिनेंट जनरल बीएस ठाकुर का कहना है, "हम इन लापता लोगों को ढूँढने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं." तटरक्षक बल के सैकड़ों जवान इस काम में पुलिस और सेना की मदद कर रहे हैं. लेकिन बुधवार को सिर्फ़ छह लाशें मिलीं, अब तो लोग लाशों के मिलने की उम्मीद नहीं कर रहे और मान चुके हैं समुद्र ने सबको निगल लिया. कच्छल के निवासी पुथुकुमार कहते हैं, "हमारे सारे लोगों को समुद्र ने लील लिया है, अब वे वापस कहाँ से आएँगे, उनकी लाश तक नहीं मिल रही." गिनती भारतीय अधिकारियों का कहना है कि वे लापता व्यक्तियों को तब तक मृत नहीं मान सकते जब तक कि उनकी लाश न मिल जाए, उनका कहना है कि ऐसा करने से मुआवज़े का मामला और उलझ जाएगा. सरकार के इस निर्णय को लेकर नाराज़गी भी है, एक सामाजिक कार्यकर्ता बासुदेव दास कहते हैं, "परिवार के सदस्य लापता हैं, असल में उनकी मौत हो चुकी है लेकिन कोई मुआवज़ा नहीं मिलेगा." स्थानीय संगठनों की माँग है कि अगर एक पखवाड़े के भीतर अगर इन लोगों की लाश नहीं मिलती तो भी इन लोगों मृत घोषित कर दिया जाना चाहिए. इस बीच अंडमान निकोबार में मलबा साफ़ करने का काम तेज़ी से चल रहा है जिसमें सेना के जवान लगे हुए हैं. हेलिकॉप्टरों की मदद से भारी मशीनें पहुँचाई गई हैं जो इस काम को अंजाम दे रही हैं. इसके अलावा, भारतीय सेना के जवान कई टापुओं पर अस्थायी हैलिपैड बनाने के काम में लगे हैं ताकि सेना के हेलिकॉप्टर वहाँ आसानी से आ-जा सकें. |
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