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आख़िरकार वीरप्पन मारा गया | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वीरप्पन यानी बड़ी-बड़ी मूँछों और सिर पर पाँच करोड़ के इनामवाला एक चंदन और हाथी दाँतों का बड़ा तस्कर, डेढ़ सौ से ज़्यादा लोगों और दो हज़ार से भी ज़्यादा हाथियों का हत्यारा वीरप्पन आख़िर मारा गया. यह सर्वविदित तथ्य था जो उसी मौत के बाद स्पष्ट रुप से दिखाई पड़ा कि वह एक वर्ग के लिए आदर्श था और आदर का पात्र. वीरप्पन के मारे जाने को तमिलनाडु पुलिस वर्ष 2004 की अपनी उपलब्धि के रुप में देख सकती है और चाहे तो कई दशकों की बड़ी उपलब्धियों में गिन सकती है. पिछले तीस सालों से कर्नाटक और तमिलनाडु राज्य की सरकारों के गले की हड्डी बना वीरप्पन, अक्टूबर महीने के तीसरे सोमवार यानी 18 नवंबर की रात को तमिलनाडु पुलिस की स्पेशल टास्क फ़ोर्स के हाथों मारा गया. यह मुठभेड़ कर्नाटक-तमिलनाडु की सीमा पर स्थित धर्मपुरी जिले के पप्परापट्टी गाँव में हुई जिसमें वीरप्पन के अलावा उसके तीन अन्य साथियों, सेतुगुड़ी गोविंदम, चंद्रैगौड़ा और सेतुमणि भी मारे गए. पिछले दो दशकों से भी लंबे समय से इन दोनों राज्यों की पुलिस ने वीरप्पन को पकड़ने के लिए एक संयुक्त अभियान छेड़ रखा था जिसे कई सालों तक जंगलों की ख़ाक छानने और 150 से भी ज़्यादा पुलिस व वन-अधिकारियों की जिंदगी की क़ीमत अदा करने के बाद मारा जा सका. रुपए कितने खर्च हुए इसका तो कोई हिसाब ही नहीं है. विवादित व्यक्तित्व लेकिन अभी वीरप्पन का विवाद ख़त्म नहीं हुआ है वह मरकर भी विवादों के घेरे में है. पहले पकड़े जाने का विवाद और फिर मारे जाने का विवाद. चर्चा तो यह भी थीं कि पहले वीरप्पन को गिरफ्तार किया गया और फिर उन्हें फ़र्जी मुठभेड़ दिखाकर मारा गया.
दूसरी ओर कुछ लोगों का तर्क था कि वीरप्पन अपने राजनीतिक संबंधों के चलते ही लंबे समय से पुलिस की पहुँच से दूर था और अब उसे इसलिए मार दिया गया ताकि राजनीतिक हस्तियों से उसके संबंधों का राज़ लोगों के सामने न आ जाए. और तो और, वीरप्पन की मौत के बाद उसका अंतिम संस्कार भी विवादित रहा. वीरप्पन के घरवालों और उसके गाँव के लोगों को आस थी कि वीरप्पन का पार्थिव शरीर उनके बीच लाया जाएगा पर ऐसा नहीं हुआ और आनन-फानन में पुलिस ने उसका अंतिम संस्कार कर दिया. विवादों की एक तह कई सालों तक चले पुलिस के खोजी अभियान के नीचे भी है जहाँ मानवाधिकारों के उल्लंघन को पुलिस और मद्रास हाईकोर्ट ने स्वीकार किया है. वीरप्पन की मौत के बाद उसकी पत्नी मुथुलक्ष्मी ने अपनी दो बेटियों के भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त की है. कब्र पर मेला यूँ तो वीरप्पन के अपराधों की सूची से कितने ही उपन्यासों की कहानी बन सकती है पर ऐसा नहीं है कि लोग सिर्फ़ इस व्यक्तित्व से नफ़रत करते हैं.
कई लोगों को बड़ी-बड़ी मूछों और सीधी-सपाट ज़िंदगीवाला यह दस्यु काफ़ी प्रभावित भी करता रहा है और यही वजह है कि लोग उसकी कब्र पर फूल-मालाएँ चढ़ा रहे हैं, अगरबत्तियाँ जला रहे हैं. उसकी पत्नी उसे एक अच्छा पति और अच्छा पिता मानती हैं. वीरप्पन की कब्र पर आनेवालों में महिलाओं की भी बड़ी संख्या है. इन लोगों का मानना है कि वीरप्पन ने गरीब लोगों को नहीं सताया, उनकी मदद ही की. कुछ प्रशंसक अब वीरप्पन की कब्र पर एक स्मारक बनाने का मन बना रहे हैं. |
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