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गुरुवार, 21 अक्तूबर, 2004 को 16:55 GMT तक के समाचार
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ख़ूँख़ार वीरप्पन की ऐसी भी 'छवि'!

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वीरप्पन के अंतिम संस्कार के मौक़े पर सैंकड़ो लोग जमा हुए
आम तौर पर एक ख़ौफ़नाक डाकू और कुख्यात चंदन तस्कर के रूप में चर्चित वीरप्पन के मारे जाने को स्पेशल टास्क फ़ोर्स और प्रशासन एक बड़ी उपलब्धि मान रहा है.

लेकिन धर्मपुरी के आसपास के इलाक़ों में लोगों की राय अलग ही है, इसका एहसास मुझे उस समय हुआ जब मंगलवार की सुबह मैं धर्मपुरी के सरकारी अस्पताल पहुँचा जहाँ वीरप्पन और उनके तीन सहयोगियों के शव रखे थे.

लोगों की भीड़ उमड़ रही थी और देखते ही देखते हज़ारों लोग आसपास के ज़िलों से पहुँचने लगे.

वहाँ बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी मौजूद थे लेकिन लोगों की भीड़ इतनी कि स्थिति उनके नियंत्रण से बाहर हो रही थी.

ज़्यादातर लोगों को वीरप्पन के मारे जाने का अफ़सोस था.

शायद लोगों की ऐसी प्रतिक्रिया का ही असर था कि बुधवार को सुबह-सुबह ही मूलाकाडू में वीरप्पन को दफ़ना दिया गया.

सहानुभूति

मूलाकाडू के बारे में पुलिस के साथ-साथ कई लोगों ने मुझे बताया था कि वहाँ सूर्यास्त के बाद जाना ठीक नहीं.

ख़ैर मैं भी मूलाकाडू के लिए रवाना हुआ. रास्ते में मेरी मुलाक़ात एक स्थानीय बैंक कर्मचारी कुमार से हुई. बिना पूछे ही वे वीरप्पन के बारे में बोलने लगे.

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वीरप्पन से सहानुभूति रखने वालों की बड़ी संख्या है

कुमार ने कहा, "वीरप्पन ने ग़रीबों के लिए बहुत किया, वो अच्छा आदमी था."

कुमार ने मुझे बताया कि कैसे वीरप्पन ने ग़रीब परिवारों की सहायता की, उनकी लड़कियों की शादी के लिए पैसे दिए और इलाज के लिए भी लोगों की माली सहायता की.

कुछ इसी तरह की प्रतिक्रिया मुझे आसपास के गाँवों और छोटे शहरों में भी मिली.

मेत्तूर में सुब्रमण्यम एक बिजली के समान की दुकान चलाते हैं. पुलिस और राजनीतिक दलों से घबरा रहे सुब्रमण्यम पहले तो बोलने से कतराए, फिर दबी ज़ुबान से कहा, 'वीरप्पन की लड़ाई सरकार के ख़िलाफ़ थी.'

क़ब्रिस्तान का दृश्य

मेत्तूर से होता हुआ जब मैं मूलाकाडू पहुँचा तो हर घर के बाहर लोगों की भीड़ जमा थी.

बिना पूछे लोगों ने हमें क़ब्रिस्तान का रास्ता बता दिया. आस-पास पहाड़ थे और कीकड़ की झाड़ के बीच एक नई क़ब्र बनी थी. अभी भी वहाँ बड़ी संख्या में लोग जमा थे.

 'नहीं, वीरप्पन ने मेरी कोई मदद नहीं की. लेकिन वो ग़रीबों के लिए लड़ाई लड़ रहा था.
एक बूढ़ी महिला

वहाँ का दृश्य बड़ा ही भावुक था. कुछ औरतें रो रही थीं, कुछ लोग क़ब्र के पास ज़मीन पर सिर झुकाए बैठे थे.

एक व्यक्ति ने तो क़ब्र के पास की मिट्टी उठाकर कपड़े के एक टुकड़े में बाँध लिया.

वीरप्पन की क़ब्र पर गुलाबी फूल चढ़े थे, वहाँ नारियल के टुकड़े भी पड़े और अगरबत्तियाँ भी जलाई गईं थीं.

वहीं वीरप्पन के एक पुराना मित्र भी खड़े थे. उन्होंने 20 सालों से वीरप्पन को नहीं देखा था लेकिन दोस्ती की ख़ातिर वे क़ब्रिस्तान तक पहुँच ही गए थे.

वहाँ मौजूद एक बूढ़ी महिला बिलख-बिलख कर रो रही थी. वीरप्पन की मौत के साथ-साथ उनका अपना दुख भी कम नहीं था.

उनके दो लड़कों को वीरप्पन का समर्थक होने के शक में एसटीएफ ने मार डाला था.

और तो और पुलिस ने उन्हें भी कम यातना नहीं दी थी. इसका सबूत भी दिखाया उस महिला ने. उनके हाथों और पाँव पर ज़ख़्म के निशान थे.

उस महिला की हालत देखते हुए भी जिज्ञासावश मैंने उनसे सवाल कर ही लिया कि क्या उनके दोनों बेटों की मौत के बाद वीरप्पन ने उनकी भी सहायता की.

तो उनका जवाब था-'नहीं, वीरप्पन ने मेरी कोई मदद नहीं की. लेकिन वे ग़रीबों के लिए लड़ाई लड़ रहे थे.'

उस महिला की बात का समर्थन वहाँ मौजूद लोगों ने भी किया.

मुठभेड़ पर सवाल

राजू कड्डलूर से आए थे. वीरप्पन की कथित मुठभेड़ में मौत को लेकर वे नाराज़ दिख रहे थे.

उन्होंने कहा, ''यह एक फर्ज़ी मुठभेड़ थी, पुलिस द्वारा किया गया एक नाटक था.''

आसपास के इलाक़े में ग़रीबों के मसीहा के रूप में चर्चित वीरप्पन को अपने परिवार की कितनी परवाह थी.

यही जानने मैं पहुँचा टीएमसी नगर स्थित वीरप्पन की पत्नी मुथुलक्ष्मी के घर. घर में परिवारजनों के साथ-साथ पड़ोसी भी घर के अंदर और बाहर जमा थे.

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मुठभेड़ पर भी उठ रहे हैं सवाल

मुथुलक्ष्मी ने मुझ जो भी बताया उससे आश्चर्य तो ज़रूर हुआ. चंदन और हाथी दाँत के कुख्यात तस्कर की बीबी को घर चलाने के लिए अपनी साड़ियाँ तक बेचनी पड़ती थी.

अगर मुथुलक्ष्मी की माने, तो सच यही था. मुथुलक्ष्मी ने मुझे बताया कि वीरप्पन कभी-कभार अपनी लड़कियों के स्कूल की फीस के लिए पैसे भेजते थे लेकिन ज़्यादातर उन्हें साड़ियाँ बेचकर ही घर चलाना पड़ा.

वीरप्पन के साथ एसटीएफ की मुठभेड़ की स्थितियों को लेकर सवाल तो उठे ही हैं. कई मानवाधिकार संगठनों का भी यही मानना है.

प्रोफेसर कल्याणी एक मानवाधिकार संगठन से जुड़े हैं. उनका भी यही मानना है कि वीरप्पन को मारा गया था और कोई मुठभेड़ नहीं हुई थी.

ऐसे समय जब सारा देश एसटीएफ की उपलब्धियों के गुणगान में जुटा है, एक ऐसा तबका भी है जो इस पूरे घटनाक्रम पर सवाल उठा रहा है.

आम लोगों के मन में मुठभेड़ को लेकर पैदा हुए शक को सही ठहराते हैं पेरियार द्रविड़ कणगम के नेता और एलटीटीई समर्थक कोलाथूर मणि. मणि ने राजकुमार की रिहाई के लिए मध्यस्थता भी की थी.

मणि बताते हैं कि वीरप्पन ने तमिल लोगों के समर्थन में झंडा बुलंद किया.

हालाँकि वीरप्पन द्वारा तमिल राष्ट्रवाद पर एक नई छवि बनाने के प्रयास से आम लोगों को कुछ लेना-देना नहीं था.

लेकिन इतना तो सच है कि उनके मन में वीरप्पन की छवि प्रशासन और मीडिया से अलग है और लगता तो यही है कि यह वीरप्पन की यह छवि उनके दिलो-दिमाग़ में बरक़रार रहेगी.

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