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वीरप्पन को समर्पण का मौक़ा दिया था | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चंदन तस्कर वीरप्पन को ढ़ूढ़ निकालने वाले पुलिस प्रमुख ने कहा है कि वीरप्पन को जीवित पकड़ना मुमकिन नहीं था. स्पेशल टास्क फ़ोर्स के प्रमुख के विजय कुमार ने कहा है कि वीरप्पन को आत्मसमर्पण करने का मौक़ा दिया गया था मगर जब पुलिसकर्मियों पर गोलियाँ चलाई गई तो पुलिस को अपने बचाव के लिए गोलियाँ चलानी पड़ी. वीरप्पन की पत्नी और कई मानवाधिकार गुटों का कहना है कि वीरप्पन को आत्मसमपर्ण के लिए मजबूर करना चाहिए था. उन्होंने सवाल उठाया है कि 100 हथियारबंद पुलिसकर्मियों ने वीरप्पन को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर क्यों नहीं किया या उसे घायल क्यों नहीं किया गया. वीरप्पन की विधवा ने वीरप्पन की मौत की जाँच करवाने का आग्रह किया है. विजय कुमार ने कहा कि वीरप्पन की मौत की एक ही कहानी है और लोगों को पुलिस पर विश्वास करना चाहिए. उन्होंने कहा कि एसटीएफ़ को ये निर्देश दिया गया था कि वीरप्पन को पकड़ाना है-ज़िंदा या मुर्दा. चार पुलिस अधिकारियों ने भेस बदलकर वीरप्पन के गुट में काम किया और वीरप्पन के इलाज के लिए एक मुलाक़ात करवाई. उस समय पुलिस ताक में बैठी थी. कुमार ने कहा, “मुझे लगा कि वीरप्पन गाड़ी से बाहर आ जाएगा, मगर वो अंदर ही बैठा रहा.” पुलिस की कार्रवाई के बारे में और जानकारी देते हुए कुमार ने कहा कि वीरप्पन अपने गुट में नए लोगों को भर्ती करने में सफल नहीं हो पा रहा था जिससे पुलिस को कुछ ख़ुफ़िया जानकारी मिली और ये कार्रवाई हुई. उन्होंने कहा कि एसटीएफ़ ने पेरुंबलूर और कुड्डालोर में वीरप्पन की नए लोगों को भर्ती करने की प्रक्रीया में अड़चने पैदा कर दी थी. हालांकि विजय कुमार ने माना की पुलिस की कार्रवाई के बावजूद वीरप्पन से जुड़े दूसरे बड़े गुटों का पर्दाफ़ाश नहीं हो पाया है. |
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