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सेटेलाइट प्रणाली से दुर्घटना रोकेगा रेलवे | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
रेलवे में दुर्घटनाएँ रोकने के लिए रेलवे अपना सेटेलाइट सिस्टम स्थापित करने जा रहा है. ख़ासकर दो ट्रेनों की आमने-सामने की टक्कर जैसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए दूर संचार, सिग्नलिंग प्रणाली और लगभग 63 हजार किलोमीटर रेलमार्ग पर निगरानी तंत्र को चाक-चौबंद करने के लिए मार्च 2005 तक रेलवे का स्वतंत्र सेटेलाइट सिस्टम काम करने लगेगा. रेलवे अधिकारियों का कहना है कि इस प्रणाली के स्थापित होने के बाद से पंजाब में दो दिनों पहले जो दुर्घटना हुई उस तरह की कोई दुर्घटना नहीं घटेगी. रेल मंत्रालय द्वारा रेलवे के आधुनिकीकरण एवं संरक्षा उपायों संबंधी बहुउद्देशीय योजना को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह एवं योजना आयोग ने पहले ही मंजूरी दे दी है. 24 हजार करोड़ रुपए की इस योजना की स्वीकृति योजना आयोग ने पिछले सप्ताह ही दी है. आत्मनिर्भरता रेल मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार रेल सेटेलाइट सिस्टम का मुख्यालय राजधानी दिल्ली स्थित रेल भवन में होगा. यह सेटेलाइट रेल इंजनों में लगे 'एंटी-कोलीज़न डिवाइस' (टक्कर रोधी यंत्र) ए.सी.डी के जरिए देश भर में रोज़ाना चल रहे लगभग 15 हजार यात्री ट्रेनों एवं मालगाड़ियों के आवागमन पर सीधे निगरानी रख सकेगा. रेलले बोर्ड के दूर संचार एवं सिग्नलिंग सदस्य के अनुसार इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) से नए सेटलाइट सिस्टम के बारे में औपचारिक बातचीत हो चुकी है और उस दिशा में काम शुरू हो गया है. रेलवे बोर्ड के सूचना निदेशक एमवाई सिद्दीक़ी के अनुसार रेलवे अभी सेटेलाइट सिस्टम का अन्य लोगों की तरह एक उपभोक्ता है, लेकिन इससे उसके विशाल नेटवर्क की आवश्यकता की पूर्ति नहीं हो पाती. इसको ध्यान में रखते हुए ही रेल मंत्रालय ने अपना निजी सेटेलाइट सिस्टम स्थापित करने का फैसला किया, जिसका उपयोग वह स्वयं करेगा. वैसे भी रेल संचालन के लिए आवश्यक दूर संचार एवं सिग्नलिंग प्रणाली आदि के लिए रेलवे पहले भी आत्मनिर्भर रहा है. रेलवे स्टेशनों से नियंत्रण इस प्रणाली के स्थापित होने के बाद जहाँ समूचे रेल संचालन और रेल नेटवर्क पर सीधे रेल मंत्रालय की निगरानी रहेगी, वहीं जोनल एवं डिविजन रेल मुख्यालयों तथा बड़े रेलवे स्टेशनों पर एक स्क्रीन के माध्यम से उस क्षेत्र की सभी ट्रेनों का आवागमन नियंत्रित किया जा सकेगा. सिद्दीक़ी के अनुसार, "इससे कौन ट्रेन कहाँ किस रूट पर और किस स्थिति में है यह सब एक कंट्रोल रूम में बैठकर देखा जा सकेगा. इससे दुर्घटनाओं को रोकने में तो मदद मिलेगी ही रेलवे को व्यावसायिक लाभ भी होगा." उनका कहना है कि जिस तरह रेलवे ने 'रेल टेल' नाम से अपना दूरसंचार नेटवर्क बनाया है. उसी तरह सेटेलाइट भी वह अपना नेटवर्क स्थापित करेगा. कुछ साल और वहीं दूसरी ओर रेलवे बोर्ड के एक वरिष्ठ सदस्य के अनुसार पूर्ण रुप से सुरक्षित रेल यात्रा के लिए कुछ वर्षों तक इंतजार करना होगा. इसकी पहली दिक़्क़त यह है कि ए.सी.डी प्रणाली को देश में 40 हजार किलोमीटर रेल मार्ग पर लगाया जाना है. इस पर खर्च तो लगभग 500 करोड़ रुपए ही है, लेकिन इस प्रणाली को लगाने का लक्ष्य पाँच से छह वर्ष निर्धारित किया गया है. योजना आयोग ने 24 हजार करोड़ रुपए रेल सुरक्षा एवं आधुनिकीकरण के लिए स्वीकृत कर दिया है. इसके अलावा रेलवे सुरक्षा की दस वर्षीय एक अलग योजना है. जिस पर 34 हजार करोड़ रुपए खर्च किया जाना है. 2001 में न्यायाधीश खन्ना समिति की संरक्षा संबंधी रिपोर्ट में सिफ़ारिशें की गई थीं. इंजन की आँख टक्कररोधी यंत्र (ए.सी.डी.) प्रणाली कोंकण रेलवे की एक बड़ी खोज है. रेलवे लाइन पर ट्रेन के सामने किसी भी अवरोध को रेल इंजन में लगा ए.सी.डी. यंत्र ट्रेन को स्वतः स्फूर्त ढंग से रोक देगा, लेकिन 15 अक्टूबर 1991 को किए गए इस आविष्कार का प्रदर्शन करने के बाद रेलवे को इस प्रणाली को अपनाने में पाँच वर्ष लग गए. लंबे और उबाऊ परीक्षणों के बाद रेलवे ने टक्कर रोधी यंत्र लगाने का फैसला किया. शुरूआत में इसे पूर्वोत्तर सीमावर्ती रेलों में लगाने की घोषणा की गई है.
जालंधर-पठानकोट सेक्शन में मंगलवार को ट्रेनों की जो टक्कर हुई उस मार्ग पर ए.सी.डी. प्रणाली लगाने का काम चल रहा था. टक्कर रोधी यंत्र जिसे कोंकण रेलवे के अध्यक्ष बी. राजाराम ने रेलों का 'रक्षा कवच' नाम भी दिया है. इस प्रणाली का पहली बार प्रदर्शन करते हुए दावा किया था, "यह रेल इंजन की आँख का काम करेगा." ड्राइवर की नजर से सिग्नल की चूक या लापरवाही और वर्षा अथवा घने कोहरे में यह प्रणाली तीन किलोमीटर तक देख सकती है और खतरे को भाँप कर ट्रेन को धीरे-धीरे रोक देगी. तकनीकी भाषा में रेल लाइन पर बड़े अवरोधक अथवा एक ही लाइन पर दो ट्रेन आ जाने पर इंजन में लगी ए.सी.डी. प्रणाली सेटेलाइट के माध्यम से संदेश प्राप्त करेगी और अपना काम कर देगी. इस प्रक्रिया के दौरान ड्राइवर अंजान रहे या सोता रहे तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा और ट्रेन खड़ी हो जाएगी. चालू वर्ष में 1700 किलोमीटर रेल मार्ग पर यह प्रणाली लगाई जा रही है. |
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