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रविवार, 05 दिसंबर, 2004 को 05:22 GMT तक के समाचार
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मुनाबाव-खोखरापार रेल पर सरहद में शक

मुनाबाव रेलवे स्टेशन
चालीस साल पहले बंद हो गई थी रेल सेवा
भारत और पाकिस्तान के सिंध-राजस्थान रेल मार्ग फिर से शुरू करने पर बनी सहमति ने राजस्थान में फिर एक बार आशाओं के दीप जला दिए हैं.

लेकिन सरहद पर बसे लोगों को लगता है कि यह रेल मार्ग शायद ही कभी शुरू हो.

भारत के विदेश मंत्री नटवर सिंह ने इसे अगले वर्ष अक्टूबर से शुरू करने की घोषणा की है.

कभी वाघा-अटारी से भी ज़्यादा व्यस्त रहने वाले इस रेल मार्ग पर पिछले चार दशकों से पहिया नहीं धूमा है.

1965 के भारत-पाक जंग के दौरान इस मार्ग पर आखिरी बार रेल दौड़ी थी. इसके बाद सरहद के लोग इन पटरियों पर भारत-पाक संयुक्त रेल सेवा देखने को तरस गए.

पाकिस्तान के सूबा सिंध से भारत आ बसे तेज़दान देथा कहते हैं, "पाकिस्तान में पंजाब का वर्चस्व है और पंजाब कभी नहीं चाहेगा कि अब रेल मार्ग शुरू हो. क्योंकि इस पंजाब को राजस्व से हाथ धोना पड़ेगा और उसकी महत्ता भी कम होगी."

तैयारियाँ पूरी

भारत ने अपने हिस्से में पूरी तैयारियाँ कर रखी हैं.

1986 में ऐसा ही माहौल बना था और भारत ने बीस लाख रूपए ख़र्च कर इस सीमा पर भारतीय रेलवे के अंतिम स्टेशन मुनाबाव को अंतरराष्ट्रीय मानक के मुताबिक़ तैयार कर लिया था.

 पाकिस्तान में पंजाब का वर्चस्व है और पंजाब कभी नहीं चाहेगा कि अब रेल मार्ग शुरू हो. क्योंकि इस पंजाब को राजस्व से हाथ धोना पड़ेगा और उसकी महत्ता भी कम होगी
तेज़दान देथा

रेलों की समय-सारिणी बनी, तिथि तय हुई और यकायक पाकिस्तान ने हाथ खींच लिया. तब से बराबर इस रेल मार्ग को खोलने की घोषणाएँ होती रहती हैं.

इस मार्ग के बंद होने से राजस्थान के सीमावर्ती इलाकों में बसे लोगों को सरहद के उस पार आबाद अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए 2500 किलोमीटर लंबा सफर तय करना होता है.

यह महंगा और कष्टकारी है. जबकि यही यात्रा वे कुछ रूपयों और घंटों में इस मार्ग से कर सकते हैं.

अलग सा बँटवारा

भारत विभाजन के समय सिंध और राजस्थान में आबादी का एक मुश्त धार्मिक आधार पर तबादला नहीं हुआ था. इसीलिए सरहद के दोनों तरफ मिश्रित आबादी है और हिंदू-मुसलमानों में दोस्ताना संबंध है.

यही कारण है कि 1947 में दंगों के दौरान यही रेल ऐसी थी तो लाशें नहीं ढो रही थी.

दोनों तरफ जैसी ज़बान, लिबास और संस्कृति है. मगर सियासत ने दोनों के बीच बातों की बाड़ खड़ी कर रखी है. डेढ़ दशक पहले जब सरहद पर तारबंदी नहीं थी, लोग चोरी-छिपे रिश्तेदारों से मिलने चले जाते थे. अकाल, सूखे के वक्त भी लोग सिंध के नहरी क्षेत्र में अपने मवेशियों के साथ पनाह लेते थे.

जोधपुर रियासत ने सन 1900 में इन्ही दिनों दिसंबर में 41 लाख रूपए खर्च की लागत से 143 मील लंबे रेल मार्ग को बाड़मेर और सिंध के सादीपली के बीच प्रारंभ किया था.

हैदराबाद-सिंध और सादीपली के बीच 1890 में रेल मार्ग शुरू हो चुका था.

 हमने सालों से अपने रिश्तेदारों और दोस्तों की शक्ल नहीं देखी
ईशाखां राजड़

विभाजन के बाद दोनों मुल्क की सहमति तक रेलगाड़ियाँ चलाने थे. भारत बाड़मेर-मुनाबाव के बीच बड़ी रेल लाइन बिछा दी है. वो भी ख़राब हालत में है.

बाड़मेर-मुनावाब के मध्य अच्छी सड़क भी बिछी हुई है. लेकिन पाकिस्तान क्षेत्र में 40 किलोमीटर तक कोई सड़क नहीं है. ऐसे में सिंधी मुस्लिम समाज के पूर्व अध्यक्ष ईशाखां राजड़ कहते हैं "हमने सालों से अपने रिश्तेदारों और दोस्तों की शक्ल नहीं देखी."

पूर्व सांसद कुलदीप नैयर मानते हैं कि जब वे पाकिस्तान गए थे तो वहाँ बड़ी तादाद में लोगों ने सिर्फ राजस्थान मार्ग खोलने मांग की. मोलज़िर क़ौमी इतेहाद ने गत चुनावों के दौरान पत्र में इस मार्ग को शामिल किया था.

मुनाबाव में जल्द सीमा रक्षकों की आवाजाही इस वीराने को तोड़ती है. लेकिन सियासत को मानवीय संबंधों का मधुर संगीत नहीं, शायद ऐसे ही सन्नाटे की चाहत है. इसीलिए रेल का पहिया नहीं धूम रहा है.

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