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मंगलवार, 12 अक्तूबर, 2004 को 13:01 GMT तक के समाचार
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जमाइयों की जन्नत पीपल्दा कलाँ

प्रहलाद सुमन
ये हैं प्रहलाद सुमन जो बरसों पहले दामाद बनकर पिपल्दा कलाँ में ही रह गए थे
राजस्थान का एक गाँव जमाइयों या दामादों को ऐसा पसंद आया है कि वे शादी के बाद वहीं के होकर रह गए.

इन दामादों की संख्या चार सौ से ज़्यादा है.

लोग मध्यप्रदेश की सीमा से सटे कोटा ज़िले के इस पीपल्दा कलाँ गाँव की बस्ती के नाम से जानते हैं.

अब तो दामादों ने वहाँ अपना सगंठन भी बना लिया है.

इस गाँव में बाबुल की दुआओं के साथ बेटियों को बिदाई तो दी जाती है लेकिन उन्हें अपने पालनहारों की आँखों से दूर नहीं जाना पड़ता.

ऐसे सैकड़ों किस्से हैं जब जमाइयों राजा अपनी ससुराल में ही बस गए.

गाँव के गोपाल सैनी से दामादों की संख्या पूछी तो वे अंगुलियों पर गिनने लगे. श्री सैनी हिसाब लगाकर बताते हैं कि वार्ड में 25 से 30 दामाद हैं. वार्ड संख्या 11 में सबसे ज़्यादा यानी 65 हैं.

वैसे दामादों की कुल गिनती 400 से ज़्यादा है.

जाति धर्म नहीं

जमाइयों के ससुराल में बसने का यह चलन किसी ख़ास जाति या धर्म तक सीमित नहीं है. सभी जातियों में इसका चलन है.

ग्रामीण
पीपल्दा कलां को दामादों या जँवाइयों के गाँव के रुप में जाना जाता है

पीर मोहम्मद को शादी के बाद पीपल्दा ऐसा रास आया कि यहीं बस गए. और अब पीर मोहम्मद के दो दामाद भी यही रहने लगे हैं.

पीर मोहम्मद की बेटी फरीदा अपने शौहर के साथ पीपल्दा में ही रहती है. फरीदा कहती है- "माँ-बाप की आँखों के सामने रहने से दिल खुश रहता है."

दामाद संगठन

पीपल्दा के चंद्रशेखर देशबंधु ने इन दामादों का संगठन खड़ा कर लिया है. दामाद परिवार के अध्यक्ष देशबंधु कहते है, "यहाँ दामादों का बड़ा सम्मान है. इस बार दामाद परिषद सरपंच पद के लिए अपना प्रत्याशी खड़ा करेगी."

 यहाँ दामादों का बड़ा सम्मान है. इस बार दामाद परिषद सरपंच पद के लिए अपना प्रत्याशी खड़ा करेगी
चंद्रशेखर देशबंधु

60 वर्षीय पुरूषोत्तम शर्मा के दामाद इसी गाँव में आबाद है.

वे कहते हैं, "बेटी और दामाद का आँखों के सामने रहना अच्छा लगता है, लेकिन जब कभी बेटी को तकलीफ में देखते हैं तो दुख भी होता है."

पीपल्दा के राजेन्द्र सिंह आसावत से पूछा कि ऐसा क्या है कि इस गाँव में दामाद यही के होकर रह जाते है? तो उन्होंने कहा, "दरअसल दामादों को इज़्ज़त देकर गाँव के लोग अपनी बेटियों के प्रति भी समान व्यक्त करते हैं, यह पुत्रियों के प्रति माँ-बाप के स्नेह का परिचायक है."

पंचायत के चुनाव आने वाले हैं और दामादों की निगाहें सरपंच की कुर्सी पर टिकी हैं. पर उन्हें नहीं मालूम की सियासत तो भाई-भतीजावाद को ज़्यादा तरजीह देती है, दामादों को कम.

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