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सोरेन को न्यायिक हिरासत में भेजा गया | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
झारखंड राज्य की एक अदालत ने झारखंड मुक्ति मोर्चा नेता शिबू सोरेन को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है. सोरेन ने 30 साल पुराने एक मामले में गिरफ़्तारी वारंट निकलने के बाद नाटकीय गतिविधियों के बाद जामताड़ा की स्थानीय अदालत में समर्पण किया. उनके समर्पण करने के फ़ौरन बाद उनके वकीलों ने न्यायाधीश के सामने ज़मानत के लिए आवेदन दिया. मगर अदालत ने उन्हें ज़मानत देने से इनकार करते हुए सोरेन को न्यायिक हिरासत में भेज दिया. शिबू सोरेन के वकील संजीव कुमार मेहता ने कहा है कि फ़ैसले के ख़िलाफ़ राँची हाईकोर्ट में अपील की जाएगी. उन्होंने कहा कि वे और उनके मुवक्किल क़ानून का पालन करनेवाले नागरिक हैं इसलिए अदालत जो भी फ़ैसला देती है उसका वे सम्मान करेंगे. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पूरे राज्य में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है. शिबू सोरेन ने भी अपने समर्थकों से शांति बनाए रखने की अपील की है. वारंट झारखंड नेता के ख़िलाफ़ पिछले महीने जामताड़ा सत्र न्यायालय ने वारंट जारी किया था जिसके बाद सोरेन का लगभग 10 दिनों तक कोई अता-पता नहीं था. इस मामले में विपक्ष ने संसद और बाहर जमकर हंगामा किया जिसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कहने पर सोरेन ने इस्तीफ़ा दे दिया. शिबू सोरेन के वकील ने गिरफ़्तारी वारंट आने के बाद से राँची हाईकोर्ट में अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी दी थी मगर पिछले गुरूवार को हाईकोर्ट ने कहा कि सोरेन को पहले समर्पण करना होगा. झारखंड आँदोलन के प्रमुख नेता के ख़िलाफ़ ये मामला 1975 का है जब शिबू सोरेन की अगुआई में हो रही एक रैली में एक दूसरी जगह की ख़बर मिलने के बाद लोग हिंसक हो उठे और उन्होंने वहाँ जाकर मार-पीट की . शिबू सोरेन पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने उस भीड़ को उत्तेजित किया जिसने 11 लोगों को मार डाला था. उनमें 10 ऐसे मुसलमान थे जो ऐसी ज़मीनों पर बस गए थे जिसे आदिवासी अपनी बताते थे. |
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