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शुक्रवार, 30 जुलाई, 2004 को 07:13 GMT तक के समाचार
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सोरेन सामने आए, अपना आरोप दोहराया
शिबू सोरेन
1975 में तत्कालीन बिहार के चिरूडीह में हुए एक हत्याकाँड के मामले में वारंट जारी हुए थे
पूर्व केंद्रीय मंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष शिबू सोरेन शुक्रवार को राँची में सार्वजनिक रुप से दिखाई पड़े.

उन्होंने अपने बेटे के घर पर पत्रकारों को बुलाकर बात की और दोहराया कि उनके ख़िलाफ़ चल रहा मामला राजनीति से प्रेरित है.

17 जुलाई को उनके ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी वारंट जारी होने के बाद से उनका अता-पता नहीं था.

यहाँ तक कि जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब उनसे केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा देने को कहा तो उन्होंने अपना इस्तीफ़ा भी फ़ैक्स से भिजवाया था.

शिबू सोरेन ने इस बात से इंकार किया कि वे क़ानून से भाग रहे थे. उन्होंने कहा कि वे पिछले बीस साल से इस मुक़दमे की सुनवाइयों में जाते रहे हैं.

उन्होंने कहा कि गिरफ़्तारी वारंट के बाद उन्होंने हाईकोर्ट में ज़मानत की याचिका दायर की थी, इस याचिका पर सुनवाई का वे इंतज़ार कर रहे थे.

यह पूछे जाने पर कि वे कहाँ थे, उन्होंने कहा कि वे गाँव में थे. उन्होंने पत्रकारों से कहा, "हम गाँव में सबके सामने थे, आप लोगों के सामने नहीं आ रहे थे, बस."

गुरुवार को झारखंड हाईकोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई के बाद कहा था कि शिबू सोरेन के ख़िलाफ़ यह मामला राजनीति से प्रेरित नहीं है और उन्हें अदालत में आत्मसमर्पण कर देना चाहिए.

राजनीति का आरोप

पत्रकारवार्ता में उन्होंने दोहराया कि उनके ख़िलाफ़ चल रहा मामला राजनीति से प्रेरित है.

उनका कहना था कि झारखंड विधानसभा में यह सर्वसम्मत निर्णय लिया गया था कि राज्य निर्माण आंदोलन और अन्य राजनीतिक मामलों को वापस ले लिया जाएगा और राज्य की भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार ने जानबूझ कर यह एक मामला वापस नहीं लिया.

इस सवाल पर कि क्या वे फिर मंत्रिमंडल में शामिल होंगे उन्होंने कहा कि उनके लिए मंत्रिमंडल महत्वपूर्ण नहीं है.

झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता सोरेन ने कहा कि अगले विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश में गठबंधन सरकार नहीं रहेगी.

उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने जिस कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के जिस गठबंधन के साथ चुनाव लड़ा था उसी गठबंधन में वे विधानसभा का चुनाव भी लड़ेंगे.

मुख्यमंत्री बनने के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह तो राज्य की जनता तय करेगी.

उन पर 1975 में चिरुडीह में एक सामूहिक हत्या कांड में शामिल होने का आरोप है. और इसी मामले में एक अदालत ने उनके ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी वारंट जारी किया था.

उस वारंट के बाद से उनका अतापता नहीं था और उनको लेकर संसद के दोनों सदनों में भारी हंगामा हुआ और कई दिनों तक कार्यवाही नहीं चल सकी.

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