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सोमनाथ लोकसभा अध्यक्ष बने | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता सोमनाथ चटर्जी को शुक्रवार को सर्वसम्मति से चौदहवीं लोकसभा का अध्यक्ष चुन लिया गया. भारत के इतिहास में इस पद पर बैठने वाले वे पहले कम्युनिस्ट नेता हैं. लोकसभा की बैठक शुरु होते ही उनके चुनाव की औपचारिकता शुरु की गई. 75 वर्षीय सोमनाथ चटर्जी के नाम का प्रस्ताव सबसे पहले कांग्रेस संसदीय दल की चेयरपर्सन सोनिया गाँधी ने रखा जिसका सदन के नेता प्रणव मुखर्जी ने समर्थन किया. दूसरा प्रस्ताव भारतीय जनता पार्टी संसदीय दल के अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने किया जिसका समर्थन नेता प्रतिपक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने किया. इसके बाद कई अन्य नेताओं ने इसी तरह के प्रस्ताव रखे. उनको अध्यक्ष बनाए जाने के प्रस्ताव का पूरे सदन ने ध्वनिमत से समर्थन किया. तब लोकसभा अध्यक्ष की आसंदी पर विखे पाटिल मौजूद थे. इसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और नेता प्रतिपक्ष लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ चटर्जी को अध्यक्ष की आसंदी तक लेकर गए. हालांकि वे चौदहवीं लोकसभा के पहले सत्र के पहले दिन ही वरिष्ठ सदस्य होने के नाते 'प्रोटेम स्पीकर' बन गए थे और अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी संभाल रहे थे लेकिन शुक्रवार को वे औपचारिक रुप से अध्यक्ष चुन लिए गए. सर्वसम्मति इससे पहले प्रमुख विपक्षी गठबंधन एनडीए ने सोमनाथ चटर्जी को समर्थन देने की घोषणा कर दी थी इसके बाद सोमनाथ चटर्जी के सर्वसम्मति से लोकसभा अध्यक्ष बनने का रास्ता साफ़ हो गया था. उनके अलावा किसी और उम्मीदवार की ओर से कोई नामांकन दाखिल नहीं किया गया था. संसद के सूत्रों के अनुसार सीपीएम नेता चटर्जी के समर्थन में 20 नामांकन दाखिल किए गए थे. कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) ने सीपीएम नेता सोमनाथ चटर्जी को लोकसभा अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव रखा था. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने भी उन्हें समर्थन देने की घोषणा की थी. उल्लेखनीय है कि वामपंथी दल तो यूपीए सरकार को समर्थन दे रहे हैं लकिन उन्होंने सरकार से बाहर रहने का फ़ैसला किया है. इसके बाद यूपीए ने सीपीएम नेता सोमनाथ चटर्जी को लोकसभा अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव किया. वामपंथी दलों ने बहुत विचार विमर्श के बाद यह पद स्वीकार करने का फ़ैसला किया. विश्लेषकों का कहना है कि वामपंथी दलों ने यह पद स्वीकार करना इसलिए स्वीकार कर लिया क्योंकि वे साफ़ संकेत देना चाहते थे कि सरकार को उनका पूरा समर्थन है और वे इसे आसानी से गिरने नहीं देंगे. |
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