| तमिलनाडु में गठबंधनों की रोमांचक लड़ाई | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक-बीजेपी गठबंधन और द्रमुक के नेतृत्व वाला प्रगतिशील जनतांत्रिक गठबंधन चुनाव में विभिन्न दाँव-पेच का इस्तेमाल कर रहे हैं. और मुक़ाबला काफ़ी रोमाँचक होता जा रहा है. अन्नाद्रमुक-बीजेपी गठबंधन के चुनाव प्रचार में अन्नाद्रमुक के संस्थापक एमजी रामचन्द्रन की फ़िल्मों के गाने इस्तेमाल किए जा रहे हैं. तमिलनाडु में एमजी रामचन्द्रन का आज भी जनमानस पर अच्छा असर माना जाता है. इसके अलावा प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का नेतृत्व और मुख्यमंत्री जयललिता की कुशल प्रशासक की छवि को सत्ताधारी अन्नाद्रमुक और बीजेपी इस चुनाव में प्रचार के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है. वैसे यहाँ की राजनीति के जानकार मान रहे हैं कि मुख्यमंत्री जयललिता के लिए इस बार रास्ता आसान नहीं है. हिन्दुस्तान टाइम्स के वरिष्ठ पत्रकार जीसी शेखर कहते हैं, "जहां तक जयललिता का सवाल है, अन्नाद्रमुक के द्रमुक से कुछ प्रतिशत ज़्यादा वोट हैं. उन्हें एक सख़्त प्रशासक भी माना जाता है. इसके अलावा प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अच्छी छवि का फ़ायदा उन्हें शहरी इलाकों में मिल सकता है."
शेखर के अनुसार, "जयललिता के ख़िलाफ़ एक सबसे बड़ी बात ये जाती है कि राज्य में सूखा पड़ा है और राज्य सरकार को लोगों का ग़ुस्सा झेलना पड़ सकता है." जयललिता का गठबंधन साथ ही जयललिता के सामने द्रमुक का बड़ा गठबंधन भी एक कठिन चुनौती है. अन्नाद्रमुक को कड़ी चुनौती दे रहे 'प्रगतिशील जनतांत्रिक गठबंधन' का नेतृत्व वहां की दूसरी द्रविड़ पार्टी द्रमुक के हाथ में है. इस गठबंधन में कांग्रेस, द्रमुक, एमडीएमके और दोनों ही कम्युनिस्ट पार्टियाँ हैं. जहाँ अन्नाद्रमुक का साथ दे रही भाजपा के राज्य में मुश्किल से पाँच प्रतिशत वोट माने जाते हैं वहीं द्रमुक के साथ आई पार्टियों में से कई का छह से दस प्रतिशत मतदाताओं में आधार है. इस तरह पहली नज़र में द्रमुक नेतृत्व वाला गठबंधन काफ़ी मज़बूत दिखाई पड़ता है. हालाँकि समाजशास्त्री वी सूर्यनारायण का कहना है कि दोनों ही द्रविड़ पार्टियाँ, कभी भाजपा, तो कभी कांग्रेस के साथ, तालमेल करती रही हैं और उन्होंने इस बार भी ऐसा ही किया है. उन्होंने कहा कि द्रमुक का गठबंधन काफ़ी मज़बूत तो लग रहा है पर चुनावी गर्मी बढ़ने के साथ ही कई मुद्दे सामने आएँगे. मसलन, रजनीकांत का असर और जिस तरह से महिलाएँ जयललिता की सभाओं में आ रही हैं, उससे स्थिति बदल भी सकती है. |
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