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रविवार, 11 अप्रैल, 2004 को 12:39 GMT तक के समाचार
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कांग्रेस की पारंपरिक सीटों का समीकरण

सोनिया गाँधी
सोनिया को इस क्षेत्र में लोगों ने हाथों-हाथ लिया है
इस बार लोकसभा चुनाव में अमेठी और रायबरेली के साथ ही सुल्तानपुर और प्रतापगढ़ की सीट भी काफ़ी महत्त्वपूर्ण मानी जा रही हैं.

नेहरू-गांधी परिवार के दो सदस्य सोनिया गांधी और राहुल गांधी, कांग्रेस के पारंपरिक क्षेत्र कहे जाने वाले, अमेठी और रायबरेली से चुनावी मैदान में ज़ोर आजमा रहे हैं.

उधर इसी परिवार के क़रीबी समझे जाने वाले कांग्रेस नेता सतीश शर्मा सुल्तानपुर लोकसभा चुनाव क्षेत्र से कांग्रेस के उम्मीदवार हैं.

सुल्तानपुर से ही लगा है- प्रतापगढ़. एक ऐसी संसदीय सीट, जहाँ कांग्रेस का काफ़ी प्रभाव रहा है.

मगर एक राय ये भी है कि इन सीटों के राजनीतिक समीकरणों में इन वर्षों में काफी बदलाव आया है.

सुल्तानपुर को छोड़कर बाक़ी तीन यानि अमेठी, रायबरेली और प्रतापगढ़ सीटें कांग्रेस की झोली में ही हैं.

सुल्तानपुर की सीट 1999 के आम चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के खाते में गई थी. वहाँ से कांग्रेस ने उतारा है- राजीव गांधी परिवार के मित्र सतीश शर्मा को.

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के लिए उठी सहानुभूति की लहर. मगर 1984 में हुए आम चुनावों के बाद, यह सीट कांग्रेस विरोधी पार्टियों के हक में ही गई है.

राहुल गाँधी
राहुल गाँधी को अमेठी में लोगों ने काफ़ी समर्थन दिया है

वरिष्ठ पत्रकार राज बहादुर सिंह के मुताबिक सुल्तानपुर में एक अलग तरह की लड़ाई चल रही है.

वह कहते हैं, “इस इलाके में पिछले कई चुनाव से ‘क्षत्रिय’ उम्मीदवार जीतते रहे हैं. सपा ने एक राजपूत को ही मैदान में उतारा है. उधर बसपा का उम्मीदवार मुस्लिम है. यहां जाटव वोट काफी हैं और मुस्लिम के साथ जाटव मिलकर एक आश्चर्यजनक परिणाम भी दे सकते हैं.”

सतीश शर्मा के अलावा यहां से भाजपा की उम्मीदवार हैं वीना पाण्डेय और बसपा के मोहम्मद ताहिर.

अगर चुनावी आँकड़ों पर एक नज़र डालें तो 1989 और उसके बाद हुए चुनाव में सुल्तानपुर सीट एक बार जनता दल, तीन बार भाजपा और एक दफ़ा बहुजन समाज पार्टी के पक्ष में गई है.

कांग्रेस 1989 के अलावा कभी दूसरा स्थान भी प्राप्त नहीं कर पाई है.

अमेठी की अलग स्थिति

वैसे अमेठी में स्थिति भिन्न हैं. गांधी परिवार के तीन सदस्य- संजय गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी यहाँ से सांसद रह चुके हैं.

अमेठी लोकसभा चुनाव क्षेत्र से नामांकन पत्र दाख़िल करने आए राहुल गांधी का जिस तरह से स्वागत हुआ, उससे लगता है कि नेहरू-गांधी परिवार का प्रभाव बरक़रार है.

कांग्रेस समर्थक
कांग्रेस समर्थकों में इस क्षेत्र में काफ़ी उत्साह है

राहुल गांधी पर आम जनता की ओर से हुई फूलों और गुलाल की बौछार ने कांग्रेसियों का मनोबल और भी बढ़ा दिया है.

हाल ही में भाजपा से कांग्रेस में शामिल हुए संजय सिंह ने बताया, ‘यहां की जनता राहुल गांधी के इस क्षेत्र से चुनाव लड़ने से बहुत खुश है और उनमें उनके पिता राजीव गांधी की छवि देखती है.

ख़ुद राहुल ने नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद कहा कि अमेठी ने उन्हें बहुत कुछ दिया है.

कांग्रेस अमेठी से सिर्फ दो बार ही चुनाव हारी है. एक बार 1977 में और फिर 1998 में और दोनों बार वह दूसरे स्थान पर मौजूद थी.

इस बार के चुनाव में राहुल गांधी के ख़िलाफ भाजपा के उम्मीदवार हैं, राम विलास वेदान्ती.

कहा तो यह भी जा रहा है कि पार्टी ने यह सीट चुनाव होने से पहले ही कांग्रेस को सौंप दी है.

हालांकि भाजपा की उत्तर प्रदेश इकाई के प्रवक्ता विजय पाठक इससे इंकार करते हैं. उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की 80 की 80 सीटें हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं. हार-जीत का फैसला तो जनता को करना है.

मगर भाजपा के हृदय नारायण दीक्षित ने इसके विपरीत नेहरू-गांधी परिवार के इस इलाके में प्रभाव को स्वीकारते हुए कहा, ‘देखिए, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि रायबरेली की जनता गांधी परिवार की हिमायती है.’

नेहरू-गांधी परिवार हावी

रायबरेली का प्रतिनिधित्व तो नेहरू-गांधी परिवार की दो पीढ़ियों ने भी समय-समय पर किया है.

इंदिरा गांधी के पति फ़िरोज़ गांधी यहाँ से 1952 और 1957 के चुनाव में सांसद थे.

यह सीट कांग्रेस पहली बार हारी थी जब इमरजेंसी के बाद 1977 के चुनाव में कांग्रेस और ख़ासतौर पर इंदिरा गांधी विरोधी लहर देशभर में चल रही थी.

 सुल्तानपुर में पिछले कई चुनाव से ‘क्षत्रिय’ उम्मीदवार जीतते रहे हैं. सपा ने एक राजपूत को ही मैदान में उतारा है. उधर बसपा का उम्मीदवार मुस्लिम है. यहां जाटव वोट काफी हैं और मुस्लिम के साथ जाटव मिलकर एक आश्चर्यजनक परिणाम भी दे सकते हैं.
राज बहादुर सिंह

उस चुनाव में इंदिरा गांधी को हराया था- भातीय लोकदल के राज नारायण ने, इसीलिए राज नारायण को ‘जाएंट किलर’ कहा जाता था.

हालांकि 1980 में, रायबरेली वालों ने इंदिरा गांधी को दोबारा सांसद चुना मगर यह सीट कांग्रेस विरोधी पार्टी को 1996 और 1998 के चुनाव में गई.

पिछले चुनाव में भी कांग्रेस ने इस सीट को दोबारा हासिल कर लिया था.

प्रतापगढ़

अगर प्रतापगढ़ की बात करें तो वैसे तो यहाँ कांग्रेस का प्रभाव रहा है लेकिन 1962 के चुनाव से ही विपक्षी पार्टियाँ जैसे भारतीय जनसंघ की घुसपैठ शुरू हो गई थी.

वरिष्ठ पत्रकार राज बहादुर मानते हैं, “यहां पर मुद्दे कोई महत्व नहीं रखते हैं. प्रतापगढ़ में यह होगा कि आप, दोनों रजवाड़ों- दिनेश सिंह का परिवार और रघुराज प्रताप सिंह, में से किस ओर हैं और चुनाव के दिन दोनों में से कौन शक्ति परीक्षण में आगे रहेगा.”

प्रतापगढ़ से इस बार मैदान में हैं बसपा के शिव नारायण मिश्र, भाजपा के रमा शंकर सिंह और कांग्रेस की रत्ना सिंह.

कांग्रेस ने इस इलाके में चुनाव प्रचार के लिए राजीव गांधी की बेटी प्रियंका गांधी को भेजने का फैसला किया है.

राहुल गांधी तो इस इलाके से चुनाव लड़ ही रहे हैं. ज़ाहिर है, कांग्रेस भी इन सीटों को अपने लिए ‘सुरक्षित’ मानती है.

मगर क्या कांग्रेस उत्तर प्रदेश और देश के दूसरे इलाकों में भी यही स्थिति पैदा कर पाएगी.

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