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क़दीर के पक्ष में प्रदर्शन का असर नहीं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक डॉक्टर क़दीर ख़ान के मामले पर सरकार के रुख़ के विरोध में शुक्रवार को आम हड़ताल का आह्वान किया गया. ग़ौरतलब है कि राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ कह चुके हैं कि डॉक्टर अब्दुल क़दीर ख़ान और दस अन्य वैज्ञानिकों ने देश की परमाणु तकनीक ईरान, लीबिया और उत्तर कोरिया को दी. लेकिन राष्ट्रपति ने इस मामले की कोई अंतरराष्ट्रीय जाँच कराने से भी इनकार कर दिया. हड़ताल का आह्वान प्रमुख विपक्षी गठबंधन मुत्तहिदा मजलिसे अमल (एमएमए) ने किया और गठबंधन ने अनेक स्थानों पर रैलियाँ निकालीं. कराची और कुछ अन्य शहरों में सामान्य कामकाज बंद रहा और परिवहन व्यवस्था पर भी असर पड़ा. लेकिन कुछ ऐसे भी स्थान रहे जहाँ लोगों ने हड़ताल के आह्वान की अनदेखी कर दी. छह इस्लामी पार्टियों के गठबंधन एमएमए की इस हड़ताल के मिला जुला असर को देखकर तो यहा कहा जा सकता है कि इस मुद्दे पर लोग एकमत नहीं हैं. हड़ताल का मुख्य असर कराची में देखा गया जहाँ ज़्यादातर सार्वजनिक यातायात व्यवस्था प्रभावित हुई और दुकानें भी बंद रहीं.
विरोध प्रदर्शनों में भी लोगों की कोई भारी संख्या नहीं थी. इन रैलियों में नेताओं ने राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ पर परमाणु वैज्ञानिक डॉक्टर अब्दुल क़दीर ख़ान की बेइज़्ज़ती करने का आरोप लगाते हुए सरकार की निंदा की. नेताओं ने आरोप लगाया कि राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ अमरीका के दबाव में आकर ही देश के इतने बड़े वैज्ञानिक के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं. जबकि सरकार इन आरोपों का खंडन करती है. यह मामला सामने आने से ज़्यादातर लोग सकते में आ गए थे लेकिन टेलीविज़न पर जब डॉक्टर अब्दुल क़दीर ख़ान ने ख़ुद ग़लती मानते हुए माफ़ी की माँग की तो लोगों को निराशा हुई. ऐसा लगता है कि अंतरराष्ट्रीय जाँच से इनकार करने और देश का परमाणु कार्यक्रम नहीं रोकने के परवेज़ मुशर्रफ़ के आश्वासन देने के बाद लोग यह मानने लगे हैं कि यह विवाद जल्दी ही ख़त्म हो जाएगा. |
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