|
क़दीर प्रकरण से उभरे सवाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने देश के सबसे बड़े परमाणु वैज्ञानिक डॉक्टर क़दीर ख़ान की तरफ़ से उत्तर कोरिया, ईरान और लीबिया को परमाणु तकनीक देने के आरोप क़बूल करने के बाद हालाँकि क़दीर ख़ान को माफ़ कर दिया है और उनपर कोई मुक़दमा नहीं चलाने का वादा भी किया है लेकिन साथ ही साथ इस विवाद में शामिल 11 दूसरे वैज्ञानिकों और सुरक्षा अधिकारियों को माफ़ी देने से इनकार भी कर दिया है. इस बैकग्राउंड में पाकिस्तान के भीतर हूक़ूमत के बाहर राजनेताओं से लेकर आम आदमी तक सभी पूछ रहे हैं कि आख़िर हूक़ूमत और क़दीर ख़ान में ऐसा क्या ख़ुफ़िया समझौता हुआ है जिसके नतीजे में मुशर्रफ़ हूक़ूमत ये समझ रही है कि अब परमाणु तकनीक का मामला दब जाएगा. लेकिन पाकिस्तानी हूक़ूमत चाहे कुछ भी समझती रहे चंद बुनियादी सवालों का जवाब अब तक नहीं मिल सका है. पहला सवाल तो ये है कि पाकिस्तान के एटमी प्रोग्राम का बजट हालाँकि ख़ुफ़िया था मगर कोई न कोई तो उसके हिसाब-किताब का ज़िम्मेदार ज़रूर रहा होगा. आख़िर वो कौन आदमी हैं जिसके ज़रिए इस प्रोग्राम के लिए बजट मिलता था और इस्तेमाल होता था? कहा जाता है कि एटमी प्रोग्राम के लिए बजट के ज़िम्मेदार एक पूर्व राष्ट्रपति ग़ुलाम इसहाक ख़ान थे, उनका नाम इस पूरी कहानी में अब तक क्यों नहीं आया. ऐसा बताते हैं कि एटम बम बनाने में पाकिस्तान के कम-से-कम दस अरब डॉलर ख़र्च हुए. ये पैसे कहाँ से आए? एक पूर्व प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो जिन्होंने 1974 में डॉक्टर क़दीर ख़ान को हॉलैंड से पाकिस्तान बुलवाया था ताकि हिंदुस्तान के मुक़ाबले में वे इस मुल्क़ को एटमी ताक़त बना सकें, उन्हें पैसा किसने और किन-किन स्रोतों से लाकर दिया. भुट्टो के ज़माने में पाकिस्तान के संयुक्त अरब अमीरात, सउदी अरब और लीबिया से बहुत क़रीबी ताल्लुक़ात थे और भुट्टो हुक़ूमत ने इन तीनों मुल्क़ों से कहा जाता है कि भारी संख्या में मदद हासिल की. ये मदद पाकिस्तान को किस आधार पर मिली? उस ज़माने में लीबिया के बारे में पश्चिमी मीडिया में ये ख़बर भी छपती रही कि कर्नल गद्दाफ़ी ने एक बार चीन के दौरे के मौक़े पर चीनी अधिकारियों को ये फ़रमाईश कर हैरान कर दिया कि लीबिया एक एटम बम ख़रीदना चाहता है और उसके लिए जितने भी पैसे चाहिए वो दे सकता है. उसी ज़माने में लीबिया के कर्नल गद्दाफ़ी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो में व्यक्तिगत दोस्ती थी. क्या इस बात की जाँच हो सकती है कि पाकिस्तान और लीबिया के दौरान एटमी रिश्ते किन शर्तों पर और किस ज़माने में शुरू हुए? राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने संपादकों से होनेवाली मुलाक़ात में ये भी कहा कि अगर पाकिस्तानी वैज्ञानिकों ने लीबिया और ईरान को मुसलमान मुल्क़ समझकर एटमी जानकारी दी तो फिर उत्तर कोरिया को परमाणु तकनीक किस ख़ुशी में बेची गई? मगर उन्होंने ये स्पष्ट नहीं किया कि पाकिस्तान के पास एटमी हथियारों के इस्तेमाल के लिए जो मिसाइल तकनीक हैं उसके बारे में ये आम धारणा क्यों है कि इस तकनीक को उत्तर कोरिया से हासिल क्यों किया गया? अगर ये बात दुरूस्त है तो फिर ये मान लेने में कोई मुश्किल नहीं होनी चाहिए कि लीबिया और ईरान से पाकिस्तान के एटमी प्रोग्राम के लिए पैसा मिला और उत्तर कोरिया को मिसाइल तकनीक के बदले एटमी तकनीक दी गई. लेकिन अगर राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के ख़याल में पाकिस्तान की पिछली हुकूमतों को ये मालूम नहीं था कि उत्तर कोरिया को आख़िर कौन एटमी तकनीक पहुँचा रहा है तो उन्हें क्या ये भी मालूम नहीं था कि उत्तर कोरिया की तकनीक पाकिस्तान कैसे पहुँच रही है? क्या ये तकनीक मुफ़्त में आ रही थी या कुछ लोग ख़ुफ़िया तौर पर इसे पाकिस्तान सरकार की जानकारी के बग़ैर अपने तौर पर यहाँ लाकर एटमी हथियारों के लिए इस्तेमाल करने की तैयारी कर रहे थे? ये वो सवाल हैं जिनके जवाब कोई स्वतंत्र आयोग ही दे सकता है और अगर कोई ऐसा आयोग तैयार होता है तो फिर बहुत बड़े-बड़े लोग मुसीबत में आ सकते हैं. और जबतक इन सवालों के जवाब नहीं मिल जाते पाकिस्तान के अंदर ना तो आम आदमी संतुष्ट हो सकता है और ना ही दुनिया के बाक़ी देश. इस लिहाज़ से देखा जाए तो मसला अभी ख़त्म नहीं हुआ बल्कि शुरू हुआ है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||