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बुश और आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने एक बार कहा था कि वे इस बात की चिंता नहीं करते कि अल क़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को ज़िंदा पकड़ा जाएगा या मुर्दा. लेकिन वे लादेन को ढूँढ़ निकालेंगे. यह वर्ष 2001 की बात है. जब अमरीका सदमे में था. सदमा 11 सितंबर जैसी घटना का. अमरीका की धरती पर हुए अब तक के सबसे बड़े आतंकवादी हमले में क़रीब तीन हज़ार लोग मारे गए थे. यह एक ऐसे युग की शुरुआत थी, जिसमें हताशा थी और भय भी था. अमरीकी जनता एकाएक आतंकवाद के ख़तरे को लेकर जगी थी. ये ख़तरा मध्य पूर्व या कहीं और नहीं बल्कि अमरीकी धरती पर था. यह राष्ट्रपति बुश के लिए भी एक अहम मोड़ था. 11 सितंबर के पहले राष्ट्रपति बुश अमरीका के इतिहास में सबसे बड़ी कर कटौती के लिए जाने जाते थे और एक बड़ा शिक्षा विधेयक को लेकर भी उनकी चर्चा होती थी. समर्थन लेकिन 11 सितंबर के बाद राष्ट्रपति बुश ने अपने को युद्धकाल के राष्ट्रपति के रूप में आगे किया. उन्होंने आतंकवाद के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय लड़ाई की घोषणा की. उन्होंने दुनियाभर का दौरा किया और समर्थन जुटाने की कोशिश की.
अब 11 सितंबर की सातवीं वर्षगाँठ पर राष्ट्रपति बुश अपने कार्यकाल के आख़िरी दौर में है. लेकिन उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी घटना रही- 11 सितंबर का हमला. अमेरिकन इंटरप्राइज़ इंस्टीच्यूट के राजनीतिक विश्लेषक नॉर्मन ऑर्नस्टाइन का मानना है कि 11 सितंबर ने राष्ट्रपति बुश को अपने पद के लिए कोई उद्देश्य तो दिया. 11 सितंबर के बाद एकाएक बुश का उद्देश्य स्पष्ट रूप से दिखने लगा और वो था- आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध और उसमें विजय. इस हमले के बाद पहले अफ़ग़ानिस्तान और फिर इराक़ में राष्ट्रपति बुश ने सैनिक कार्रवाई शुरू की. और आज भी वे इस लड़ाई का बोझ उठाए घूम रहे हैं. अभी भी ये लड़ाई जीती नहीं गई है और अमरीका की छवि भी ख़राब हुई है. अपनी शक्ति का ग़लत इस्तेमाल करने के कारण उनकी कड़ी आलोचना होती है. राष्ट्रपति बुश ने सात अक्तूबर 2001 को अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सैनिक भेजे थे. उनका मक़सद था अल क़ायदा के ट्रेनिंग कैंप को ख़त्म करना और तालेबान को सत्ता से हटाना. तालेबान की सत्ता तो तुरंत गिर गई लेकिन बिन लादेन भाग गए. समय के साथ-साथ लादेन के कई सहयोगी पकड़े गए इनमें 11 सितंबर की साज़िश रचने वाले ख़ालिद शेख़ मोहम्मद भी शामिल थे. लादेन के कई साथी मारे भी गए. आरोप 19 मार्च 2003 को अमरीकी संसद के समर्थन से राष्ट्रपति बुश ने इराक़ पर हमले का आदेश दिया ताकि सद्दाम हुसैन को गद्दी से हटाया जा सके. पहले तो कई तबके में इस फ़ैसले को सही माना गया, लेकिन धीरे-धीरे इस पर सवाल उठने लगे. राष्ट्रपति बुश और उप राष्ट्रपति डिक चेनी ने कई बार सद्दाम हुसैन का नाम 11 सितंबर के हमलों से भी जोड़ा. लेकिन बाद में 11 सितंबर के मामले की जाँच कर रहे एक स्वतंत्र आयोग ने ऐसी बात से इनकार किया.
इसके बाद राष्ट्रपति बुश ने रुख़ में थोड़ा बदलाव किया और अब तर्क दिया कि सद्दाम हुसैन से बहुत ख़तरा था. 11 सितंबर की पाँचवीं वर्षगाँठ पर राष्ट्रपति बुश ने कहा था, "मुझसे अक़्सर ये पूछा जाता है कि जब सद्दाम हुसैन 11 सितंबर के हमले के लिए ज़िम्मेदार नहीं थे, तो हम इराक़ में क्या कर रहे हैं. लेकिन 11 सितंबर के बाद सद्दाम के शासन से पूरी दुनिया को बड़ा ख़तरा था." शुरू में राष्ट्रीय बुश की ये लड़ाई अमरीका में लोकप्रिय थी. लेकिन ये उस समय की बात है जब यह अपेक्षाकृत आसान जीत दिख रही थी. लेकिन अब ऐसा नहीं है. इतिहास में जॉर्ज बुश को इराक़ युद्ध के आधार पर परखा जाएगा. ये ऐसी लड़ाई है जो अमरीकी गृह युद्ध, प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध से ज़्यादा समय से चल रहा है. इस युद्ध में 4100 अमरीकी लोगों की जान जा चुकी है और इराक़ युद्ध पर अभी तक 653 अरब डॉलर का ख़र्च आ चुका है. ग़लती इस साल मार्च में कराए गए एक सर्वे में यह बात सामने आई कि क़रीब 54 प्रतिशत अमरीकी मानते हैं कि इराक़ एक नाकामी के रूप में याद रखा जाएगा और 59 प्रतिशत ये सोचते हैं कि इराक़ में अमरीकी सैनिकों को भेजना एक ग़लती थी.
राष्ट्रपति पद के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी उम्मीदवार बराक ओबामा का कहना है कि इराक़ युद्ध अमरीका के इतिहास में विदेश नीति के मोर्चे पर सबसे बड़ी नाकामी है. रिपब्लिकन पार्टी उम्मीदवार जॉन मैकेन सुरक्षा का राग तो अलाप रहे हैं लेकिन उन्होंने जॉर्ज बुश से दूरी भी बनाई है. उन्होंने तो यहाँ तक कहा है कि इराक़ युद्ध को ठीक से नहीं लड़ा गया. पिछले एक वर्ष से इराक़ में सुरक्षा स्थिति बेहतर हुई है. लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में हालात बदतर हुए हैं. 11 सितंबर की घटना के सात साल बाद बुश की वह प्रतिज्ञा कि वो लादेन को पकड़ लेगें, अभी भी पूरी नहीं हुई है. अब राष्ट्रपति बुश का कहना है कि वे लादेन के बारे में ज़्यादा ननहीं सोचते और उनके प्रभाव को उन्होंने तहस-नहस कर दिया है. चिंता लेकिन अमरीकी ख़ुफ़िया अधिकारियों की ये चिंता क़ायम है कि अल क़ायदा अन्य देशों में अपने अड्डे और ट्रेनिंग कैंप बना रहे हैं. इसी साल अमरीकी संसद में राष्ट्रीय ख़ुफ़िया निदेशक माइक मैकोनेल ने कहा था- अल क़ायदा अमरीका के ख़िलाफ़ बड़ा ख़तरा बना हुआ है.
फ़ेडेरल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टीगेशन (एफ़बीआई) के निदेशक रॉबर्ट मूलर का कहना है कि अल क़ायदा अमरीका के लिए अभी भी सबसे बड़ा ख़तरा है और अल क़ायदा के प्रभाव में देश के अंदर के आतंकवादी भी ख़तरा बने हुए हैं. अभी तक अमरीका में कोई बड़ा आतंकवादी हमला तो नहीं हुआ है लेकिन उसके कई सहयोगी देशों को ऐसे हमले झेलने पड़े हैं. राष्ट्रपति बुश का ये भी दावा रहा है कि अमरीका और अन्य सहयोगी देशों ने कई बड़े हमलों की साज़िश नाकाम की है. कई विश्लेषक यह मानते हैं कि राष्ट्रपति बुश ने इराक़ में सही किया या ग़लत- इसका सही-सही अंदाज़ा लगाने में समय लगेगा. हाल ही में बुश ने एक इंटरव्यू में कहा था- मुझे तो चिंता सिर्फ़ इस बात की है कि कहीं आतंकवाद के ख़िलाफ़ चल रही लंबी लड़ाई में देश की जनता अपना संयम न खो दे. मुझे अपनी विरासत की चिंता नहीं. जब तक वे इसका पता लगाएँगे मैं मर चुका होऊँगा. |
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