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जॉर्जिया ने चूक की, रूस चूक कर रहा है | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जॉर्जिया के राष्ट्रपति मिख़ाइल साकशविली के आकलन में थोड़ी चूक हुई है. दक्षिण ओसेतिया को लेकर जो कार्रवाई जॉर्जिया धीरे-धीरे कर रहा था, उन्होंने उसे बड़ा रूप दे दिया. उनको लगा कि ऐसा करेंगे तो रूस का कूटनीतिक रूप से आक्रामक हो रहा रुख़ थोड़ा नर्म पड़ेगा. इसके अलावा जॉर्जिया को भरोसा था कि पश्चिमी देशों का समर्थन देखकर रूस पीछे हटेगा, मगर पश्चिमी देश कोई बड़ा क़दम लेने के लिए तैयार ही नहीं थे. जॉर्जिया ये आकलन नहीं कर पाया कि उसे रूस को डराना था या दक्षिण ओसेतिया पर नियंत्रण करना था. नैटो की सदस्यता उस क्षेत्र में जॉर्जिया और यूक्रेन चाहते हैं कि वे उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नैटो) के सदस्य बन जाएँ. अमरीका भी चाहता है कि नैटो की पहुँच वहाँ तक हो जाए मगर रूस को इन देशों की नैटो की सदस्यता स्वीकार्य नहीं है. इस तरह इस संघर्ष के ज़रिए जॉर्जिया और रूस दोनों ही नैटो की सदस्यता का मसला अपनी तरह से प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं. वैसे अगर जॉर्जिया अभी नैटो का सदस्य होता तो रूस इस तरह की कार्रवाई नहीं करता. उसका आकलन अलग होता और जॉर्जिया को भी ये कार्रवाई करने से पहले नैटो को विश्वास में लेना पड़ता कि उसे शक्ति प्रदर्शन करना चाहिए या नहीं. रूसी कूटनीति रूस ने शुरू से कहा है कि वो दक्षिण ओसेतिया में शान्तिरक्षक के तौर पर थे मगर इस कार्रवाई में जिस तरह जॉर्जिया को क़दम पीछे हटाना पड़ा, उससे रूस का हाथ मज़बूत हुआ है. इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर रूस, दक्षिण ओसेतिया और स्वायत्त होना चाह रहे एक अन्य क्षेत्र अबख़ाज़िया में अपना नियंत्रण मज़बूत करना चाहे. रूस इस तरह दक्षिण ओसेतिया पर जॉर्जिया की किसी भावी कार्रवाई को रोकना भी चाहता है. अमरीका से संबंधों पर असर
रूस ने फ़िलहाल तो अपना शक्ति प्रदर्शन कर दिया है मगर दीर्घकालिक तौर पर रूस के लिए इसका असर नकारात्मक हो सकता है. नैटो का सदस्य होने और पश्चिमी देशों से नज़दीक़ी रिश्ते बनाने की इच्छा रखने वाले जॉर्जिया और यूक्रेन के लिए अब और ज़रूरी हो जाएगा कि वे नैटो की सदस्यता लें. उनके नेतृत्त्व पर इसके लिए दबाव बढ़ेगा. रूस अपने आप को एक उभरती हुई शक्ति के तौर पर देख रहा है. उसकी आर्थिक स्थिति तेल और गैस की ऊँची क़ीमतों के चलते मज़बूत हो रही है. मगर रूस ने भी विदेश नीति में एक लक्ष्य रखा था और वो था पश्चिमी देशों और अमरीका के साथ रिश्ते मज़बूत करना, जिससे रूसी अर्थव्यवस्था को मदद मिले. उसे देखें तो लगता है कि रूस ने कार्रवाई ज़रूरत से कुछ ज़्यादा कर दी है. पश्चिमी देशों में रूस को लेकर एक संदेह रहा है और वो अब गहराएगा ही. मगर रूस के साथ अमरीकी संबंध कैसे हों ये इस पर भी निर्भर होगा कि अमरीका के नए प्रशासन की इस बारे में सोच कैसी है. |
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