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रविवार, 19 अगस्त, 2007 को 08:49 GMT तक के समाचार
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थाईलैंड में नए संविधान पर जनमत संग्रह
टाकसिन शिनावाट- फ़ाइल
तख़्ता पटल के बाद से ही शिनावाट थाईलैंड से बाहर हैं
थाईलैंड में नए संविधान को लेकर रविवार को पहली बार एक राष्ट्रव्यापी जनमत संग्रह हो रहा है. वहाँ की सैन्य सरकार इसे जनादेश के तौर पर देख रही है.

इससे पहले देश की अंतरिम सरकार ने दो सौ पेज के इस क़ानूनी दस्तावेज़ को थाईलैंड के सभी घरों में भेजा था और इसके पक्ष में व्यापक प्रचार किया था.

पिछले साल थाईलैंड की सैनिक सरकार ने तत्कालीन प्रधानमंत्री टाकसिन चिनावाट को हटाकर वहाँ सैन्य शासन घोषित कर दिया था.

अब टाकसिन चिनावाट के समर्थक इस संविधान के ख़िलाफ़ प्रचार कर रहे हैं.

टाकसिन के समर्थकों का कहना है कि इस संविधान को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि इसे एक अवैधानिक सरकार ने तैयार किया है.

माना जा रहा है कि अगर सैन्य शासन की ओर से प्रस्तावित इस संविधान को बहुमत मिल जाता है तो इस वर्ष के अंत तक देश में चुनाव हो सकते हैं.

पिछले साल सेना ने सत्ता को अपने नियंत्रण में लेते वक़्त वादा किया था कि वो जल्द से जल्द देश में लोकतांत्रिक सरकार का गठन करेगी.

इस जनमत संग्रह के माध्यम से यह तय होगा कि कितनी जल्दी ऐसा हो पाता है.

संविधान का विकल्प

सेना का कहना है कि अगर ऐसा नहीं होता तो वो थाईलैंड के पुराने 16 संविधानों में से किसी एक को पूरे देश में लागू कर देगी और उस नए संविधान के तहत चुनाव में देर होना निश्चित है.

इसलिए संभव है कि लोग प्रस्तावित संविधान की अच्छाई-बुराई देखे बिना संविधान के पक्ष में मत डाल दें.

थाईलैंड के उत्तर और उत्तर-पूर्व के गांवों में संविधान का विरोध हो रहा है जहाँ ग़रीब किसान टाकसिन चिनावाट के प्रति निष्ठा रखते हैं.

विश्लेषकों और आलोचकों का तर्क है कि नए संविधान के तहत उच्च सदन के सिर्फ़ आधे ही सदस्य चुनकर आएँगे.

संविधान के दूसरे प्रावधान भी ऐसे हैं जिनके तहत चुने गए नेता की ताकत को कम करने की कोशिश की गई है.

जैसे भविष्य में प्रधानमंत्री बनने वाला व्यक्ति दो से अधिक बार इस पद तक नहीं पहुँच सकता और महाभियोग का तरीका भी बहुत सरल कर दिया गया है. सैनिक सरकार को इस जनमत संग्रह में भारी मतदान होने की उम्मीद है.

थाईलैंड के चार करोड़ 50 लाख मतदाताओं में से अगर 50 फ़ीसदी से कम लोगों ने मतदान में हिस्सा लिया तो इसका मतलब होगा कि जनता ने पिछले साल के सैनिक तख़्ता पटल को स्वीकार नहीं किया है.

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