BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
बुधवार, 04 जुलाई, 2007 को 16:03 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
'वह बहुत भयावह वक़्त था'

रिहाई का विश्वास करना कठिन था
मैं बहुत आभारी हूँ सभी लोगों का. बहुत सारे फ़लस्तीनियों ने मेरी रिहाई के लिए काम किया, ब्रितानी सरकार, पूरी बीबीसी और बहुत बड़ी संख्या में उसके दर्शकों-श्रोताओं ने साथ दिया.

पूरे वक़्त मेरे पास एक रेडियो था और मैं सुन रहा था कि लोगों का कितना असाधारण समर्थन मेरी रिहाई के लिए मिल रहा था, मेरे लिए यह एक बहुत बड़ा संबल था.

मैं वाक़ई सबका बहुत शुक्रगुज़ार हूँ, मुक्त होना अपने आप में सबसे अदभुत अनुभव है.

वह बहुत भयावह वक़्त था, आप कल्पना कर सकते हैं मैं 16 सप्ताह तक बंधक रहा. यह भयावहता हमेशा बनी रहती क्योंकि मुझे पता नहीं था कि इस संकट का अंत किस तरह होगा.

कई रातें ऐसी गुज़रीं जब मैं आज़ाद होने के सपने देखता था और आँख खुलने पर ख़ुद को क़ैद में पाता था. आज वह सपना पूरा हो गया है, मैं बयान नहीं कर पा रहा कि मैं कितना बेहतर महसूस कर रहा हूँ.

कल्पना करना मुश्किल था

यह ज़िंदा दफ़न कर दिए जाने जैसा था, दुनिया से दूर इतने समय तक क़ैद में रहने के बाद एक सामान्य जीवन की कल्पना भी कठिन लगने लगी थी.

 यह ज़िंदा दफ़न कर दिए जाने जैसा था, दुनिया से दूर इतने समय तक क़ैद में रहने के बाद एक सामान्य जीवन की कल्पना भी कठिन लगने लगी थी

रिहाई से ठीक पहले वाली रात उन्होंने कहा कि मैं अब ब्रिटेन जाने वाला हूँ तो मैं उनकी बात पर यक़ीन नहीं करना चाहता था क्योंकि एक बार पहले भी उन्होंने मुझसे यही कहा था लेकिन किसी और गुप्त ठिकाने पर ले गए थे.

उन्होंने जब मुझे कार में बिठाया तो मैंने यही सोचा कि वे एक बार फिर मुझे किसी और ठिकाने पर ले जा रहे हैं, मुझे लगा कि वे मुझे किसी और अपहर्ता गुट के हवाले करने जा रहे हैं.

गाड़ी जब गज़ा शहर के बीचोबीच आने लगी तो मुझे लगा कि शायद मेरी रिहाई का समय आ रहा है.

जब मैं गाड़ी से उतरा तो बंदूकधारी लोगों ने मुझे चारों तरफ़ से घेर लिया, मुझे लगा कि ये भी अपहर्ता हैं लेकिन तभी मैंने बीबीसी के संवाददाता फयाद अबू शमाला को देखा तो मुझे विश्वास हुआ कि मैं रिहा हो रहा हूँ.

वीडियो में वही कहा जो उन्होंने बताया था

अपहर्ता कई बार बुरी तरह से पेश आते थे, बदतमीज़ी करते थे, उन्होंने मुझे कई बार जान से मारने की धमकी दी.

एक दिन की परेशानी

एक पूरा दिन ऐसा भी था जब वे मुझे छुड़ाने की कोशिशों को लेकर बहुत परेशान थे, उन्होंने मेरे हाथ-पैर बांध दिए थे लेकिन यह सिर्फ़ एक दिन की ही बात थी.

अपहर्ताओं ने 1 जून को जो वीडियो जारी किया उसमें ग़ज़ा पट्टी के बारे में मैंने जो बाते कही हैं वे बिल्कुल सही थीं लेकिन कई बातें उसमें ग़लत भी थीं, सच में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी लेकिन मुझे पता था कि इस तरह के वीडियो की हकीक़त सब लोग जानते हैं.

उन्होंने एक बार विस्फोटकों से भरी जैकेट पहनाकर भी मेरा वीडियो बनाया लेकिन मेरे पास उनकी कही हुई बातें दोहराने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.

मेरा ख़्याल है कि मैं ठीक हाल में हूँ, तनाव और दबाव इतने लंबे समय तक और इतना अधिक था कि दिमाग़ को संतुलित रख पाना एक बहुत बड़ी चुनौती थी.

मैं तीन वर्ष तक ग़ज़ा में रहा हूँ, मुझे फ़लस्तीनी संस्कृति का अंदाज़ा है, ख़ास तौर पर ग़ज़ा में बहुत ही गर्मजोशी है. जिन दो-चार लोगों ने मुझे बंधक बनाया वे गज़ा का प्रतिनिधित्व नहीं करते.

जो कुछ हुआ उसके बावजूद मेरे मन में गज़ा की यादें हमेशा अच्छी रहेंगी.

हमास ने रिहाई में अहम भूमिका निभाई

मैंने तीन साल के दौरान 27 अपहरणों की रिपोर्टिंग की और मुझे पता था कि वे सभी मामले ज़्यादा से ज़्यादा 12 दिन में ख़त्म हो गए.

डर सच साबित हुआ

मुझे पता था कि ग़ज़ा में एक बहुत ही ख़तरनाक गिरोह है, मुझे उनके बारे में पता था, मुझे उनसे हमेशा डर भी लगता था कि वे कहीं मुझे पकड़ न लें और उन्होंने मुझे बंधक बना ही लिया.

अपहर्ता बहुत ठंडे दिमाग़ से अपना काम करते थे और ऐसा लगता था कि उन्हें किसी का कोई डर न हो. कुछ सप्ताह पहले जब उन्हें पता चला कि हमास ने मामला अपने हाथ में ले लिया है तो उनकी घबराहट दिखने लगी.

देखिए, कैसी विडंबना है कि यह इतनी बड़ी ख़बर थी ग़ज़ा से और मैं उसकी रिपोर्टिंग नहीं कर पा रहा था.

(रिहाई के बाद एलन की पत्रकारों से हुई बातचीत पर आधारित)

इससे जुड़ी ख़बरें
जॉन्स्टन की रिहाई के लिए वेबसाइट
22 अप्रैल, 2007 | पहला पन्ना
गज़ा से बीबीसी संवाददाता लापता
12 मार्च, 2007 | पहला पन्ना
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>