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बर्मा पर मानवाधिकार हनन के आरोप | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
रेडक्रॉस की अंतरराष्ट्रीय समिति (आईसीआरसी) ने बर्मा के सैन्य शासन की निंदा करते हुए आरोप लगाए हैं कि वहाँ मानवाधिकार हनन के बड़े मामले हो रहे हैं. आमतौर पर निरपेक्ष रहने वाली संस्था रेडक्रॉस ने अपना रुख़ बदलते हुए कहा है कि बर्मा के शासन के कारण हज़ारों लोग प्रताड़ित हैं. संस्था का कहना है कि सेना बंदियों का उपयोग सामान ढोने वालों की तरह कर रही है और थाईलैंड की सीमा पर रहने वाले लोगों को प्रताड़ित किया जा रहा है. रेडक्रॉस का कहना है कि बर्मा के अधिकारी इन प्रताड़नाओं के बारे में बात भी नहीं करना चाहते और न कोई कार्रवाई ही करना चाहते हैं. एक दशक पहले रवांडा में हुए जनसंहार के बाद यह पहला मौक़ा है जब रेडक्रॉस ने इतने कड़े शब्दों में किसी देश की निंदा की हो. आमतौर पर यह संस्था सरकारों के साथ अपने गोपनीय बातचीत के आधार पर मसलों को सुलझाती है लेकिन लगता है कि रेडक्रॉस को बर्मा की सैन्य सरकार से कोई उम्मीद नहीं है. आईसीआरसी का कहना है कि सेना के लोग बंदियों का उपयोग न सिर्फ़ सामान ढोने वालों की तरह करते हैं बल्कि वे उन्हें खाना भी नहीं देते. संस्था का कहना है कि कई बार तो उन्हें मार भी दिया जाता है. रेडक्रॉस का कहना है कि इन प्रताड़नाओं को उनके सदस्यों ने देखा है या फिर आम नागरिकों से किए गए साक्षात्कार से इसका पता चला है. | इससे जुड़ी ख़बरें दुनिया ने देखी बर्मा की नई राजधानी27 मार्च, 2007 | पहला पन्ना बर्मा ने रेड क्रॉस के दफ़्तर 'बंद' किए27 नवंबर, 2006 | पहला पन्ना सुरक्षा परिषद में पहली बार बर्मा पर चर्चा29 सितंबर, 2006 | पहला पन्ना बर्मा के लोकतंत्र समर्थको को वीसा नहीं16 अक्तूबर, 2004 | पहला पन्ना बर्मा को अमरीकी चेतावनी20 जून, 2003 | पहला पन्ना सू ची की रिहाई हो:संयुक्त राष्ट्र05 जून, 2003 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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