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सोमवार, 15 जनवरी, 2007 को 20:07 GMT तक के समाचार
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तिकरिती की फाँसी को लेकर विवाद
बरज़ान अल तिकरिती को दुजैल नरसंहार का दोषी पाया गया था
इराक़ में फाँसी को लेकर एक बार फिर विवाद शुरु हो गया है. इस बार विवाद सद्दाम हुसैन के भाई बरज़ान अल तिकरिती की फाँसी को लेकर है.

इराक़ सरकार के अधिकारियों ने इस फाँसी की अधिकृत फ़िल्म पत्रकारों को दिखाई है. इस फ़िल्म से पता चलता है कि बरज़ान अल तिकरिती का सिर धड़ से अगल हो गया था.

अधिकारियों का कहना है कि यह एक दुर्घटना थी और उनके साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं किया गया.

लेकिन इराक़ के सुन्नी सांसदों ने इस बात की जाँच की माँग की है कि फाँसी के दौरान बरज़ान अल तिकरिती का धड़ सिर से अलग कैसे हो गया.

सुन्नी मुसलमानों का आरोप है कि फाँसी से पहले ही उनकी हत्या कर दी गई थी या फिर फाँसी देने के बाद उनका सिर काटा गया.

निंदा

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी निंदा की जा रही है.

संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ ने सद्दाम हुसैन के दोनों सहयोगियों को फाँसी दिए जाने की निंदा की है.

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रमुख लुइस आर्बर ने कहा है कि यह फाँसी, ऐसे ही अपराध के दोषी दूसरे लोगों को सज़ा देना मुश्किल बना दिया है.

जबकि यूरोपीय संघ ने कहा है कि वह किसी भी परिस्थिति में मौत की सज़ा दिए जाने के ख़िलाफ़ है.

मिस्र में अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस ने कहा है, "हालांकि फाँसी इराक़ी प्रक्रिया है लेकिन इस बात से हमें निराशा हुई है कि अभियुक्तों को फाँसी देते वक़्त मर्यादा का ध्यान नहीं रखा गया."

उधर ब्रितानी प्रधानमंत्री के प्रवक्ता ने भी कहा है, "यदि फाँसी मर्यादित ढंग से नहीं दी गई तो यह बिल्कुल ग़लत है."

कुछ प्रतिक्रियाओं में कहा गया है कि इराक़ी अधिकारियों को फाँसी रोककर देश में एकता क़ायम करने की ओर ध्यान देना चाहिए.

इस बीच बरज़ान अल-तिकरिती और अवाद अहमद अल-बंदर दोनों के शव सद्दाम हुसैन के पैतृक स्थान तिकरित भेज दिए गए हैं.

बग़दाद के उत्तर में 180 किलोमीटर दूर स्थित इस शहर में ही उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा.

फाँसी

बग़दाद से बीबीसी संवाददाता एड्र्यू नॉर्थ ने कहा है कि फ़िल्म में पहले दोनों इराक़ी नेताओं को अगल-बगल में खड़े दिखाया गया है.

सद्दाम हुसैन की फाँसी का वीडियो
सद्दाम हुसैन की फाँसी की वीडियो फ़िल्में मोबाइल और इंटरनेट पर आ गई थीं

दोनों ने नारंगी रंग के कपड़े पहन रखे थे.

पहले सज़ा देने वालों ने दोनों के चेहरे ढँक दिए फिर फँदा कस दिया गया.

थोड़ी देर बाद फ़िल्म में दिखाया गया कि दोनों व्यक्ति गिर पड़े. इस दौरान फ़िल्म में कोई आवाज़ नहीं आ रही थी.

इसके तत्काल बाद दिखता है कि रस्सी सरकती है और बारज़ान का शरीर नीचे गिर जाता है.

इसके बाद कैमरामैन दिखाता है कि नीचे सिर विहीन एक धड़ पड़ा हुआ है और अधिकारी बताते हैं कि बारज़ान का सिर अभी भी उस कपड़े में है जिससे उसे ढँका गया था.

उसके धड़ के गर्दन का हिस्सा ख़ून से सना हुआ था.

अधिकारी बताते हैं कि अल-बंदर का शरीर उस समय भी फँदे में लटक रहा था.

प्रत्यक्षदर्शी

अधिकारियों का कहना है कि वे इस फ़िल्म को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए जारी नहीं करने वाले हैं.

सद्दाम हुसैन की फाँसी की विवादित फ़िल्में जारी होने के बाद इस बार किसी को इन फाँसियों की फ़िल्म उतारने की अनुमति नहीं दी गई थी.

इस फाँसी के प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि जब दोनों को फाँसी के तख़्ते तक लाया गया तो वे डर के मारे काँप रहे थे.

अवाद अल बंदर
पूर्व मुख्य न्यायाधीश अवाद अल बंदर को भी फाँसी दी गई

उस समय मौजूद सरकारी वकील जाफ़र अल-मुसावी ने बीबीसी को बताया कि जब फाँसी का तख़्ता खींचा गया तो उन्हें बरज़ान की रस्सी भर लटकती नज़र आई.

वे बताते हैं, "मैंने सोचा कि बरज़ान अल-तिकरिती फँदे से बच गए हैं. मैं चीख़ा कि वह फँदे से बच निकले हैं, नीचे जाकर उनकी तलाश करो. फिर मैंने नीचे जाकर देखा तो पाया कि उनका धड़ और गर्दन अलग हो चुके हैं."

यह फाँसी बग़दाद के समय के अनुसार सुबह तीन बजे दी गई.

फाँसी उसी बिल्डिंग में दी गई जहाँ तीस दिसंबर को सद्दाम हुसैन को फाँसी दी गई थी.

सरकारी प्रवक्ता का कहना है कि सद्दाम हुसैन की फाँसी के वक़्त जिस तरह से फ़ब्तियाँ कसी गईं थीं वैसा कुछ इस बार नहीं होने दिया गया.

प्रतिक्रिया

बीबीसी संवाददाता माइक वूल्डरिज का कहना है कि सद्दाम हुसैन के सौतेले भाई बरज़ान अल तिकरिती को फाँसी दिए जाने पर राजधानी बग़दाद से मिली-जुली प्रतिक्रिया सामने आ रही है.

जहाँ एक ओर बग़दाद के सबसे बड़े शिया बहुल इलाक़े सद्र सिटी में फाँसी के बाद जश्न का माहौल नज़र आया वहीं सुन्नी इलाक़ों में भारी नाराज़गी देखी गई.

इराक़ के सुन्नी मुसलमान इस बात से ख़ासे नाराज़ हैं और चाहते हैं कि मामले की पूरी जाँच करके सच को सामने लाया जाए.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि ऐसे इराक़ियों की एक बहुत बडी़ तादाद भी है जो यह मानती है कि इन फाँसियों का इराक़ के भविष्य और मौजूदा समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं है.

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