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रूस, चीन ने अमरीकी प्रस्ताव वीटो किया | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चीन और रूस ने बर्मा में सैनिक शासन के मानवाधिकार रिकॉर्ड की आलोचना करने के अमरीकी प्रयास को वीटो कर दिया है. रूस और चीन ने संयुक्त राष्ट्र में इस आशय के एक प्रस्ताव को वीटो कर दिया जिसे अमरीकी समर्थन हासिल था. इस प्रस्ताव में बर्मा से अनुरोध किया गया था कि वह राजनीतिक बंदियों को रिहा कर दे. इस प्रस्ताव को छह के मुक़ाबले नौ मतों का समर्थन हासिल हुआ. रूस और चीन ने अपने वीटो अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए इस प्रस्ताव को पारित होने से रोक दिया. 1970 के दशक के बाद से यह पहला मौक़ा है जब चीन और रूस ने एक साथ मिलकर किसी प्रस्ताव को वीटो किया है. ग़ौरतलब है कि रूस और चीन दोनों ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य हैं. अमरीका ने इस प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया था जिसमें बर्मा की सैनिक सरकार से सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने का अनुरोध करते हुए नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सू ची की कई साल से जारी नज़रबंदी पर चिंता जताई गई थी. आंग सान सू ची को 2003 से ही उनके घर में नज़रबंद किया हुआ है. आंग सान सू ची की राजनीतिक पार्टी ने 1990 में हुए चुनावों में जीत हासिल की थी लेकिन चुनाव नतीजों को सैनिक सरकार ने नज़रअंदाज़ कर दिया था. इस प्रस्ताव के अमरीकी मसौदे में बर्मा की सैनिक सरकार के हाथों केरन लोगों पर लगातार हो रहे हमलों की भी आलोचना की गई थी. संयुक्त राष्ट्र में चीन के राजदूत वांग गुवांगया ने इसकी वजह यूँ बताई, "म्यामार एक संप्रभु सरकार का अंदरूना मामला है. म्यामार में मौजूदा अंदरूनी हालात अंतरराष्ट्रीय या क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा हालात को किसी तरह का ख़तरा पेश नहीं करते हैं." दक्षिण कोरिया ने भी इस प्रस्ताव के विरोध में वोट दिया जबकि क़तर, इंडोनेशिया और कोंगो मतदान से ग़ैरहाज़िर रहे. इंडोनेशिया और क़तर ने दलील दी कि बर्मा के हालात उस देश का अंदरूनी मामला हैं और विश्व सुरक्षा के लिए किसी भी तरह से कोई ख़तरा नहीं है. अमरीकी दूत एलेक्स वोल्फ़ ने प्रस्ताव के बारे में इन देशों की राय पर निराशा व्यक्त करते हुए कहा, "यह प्रस्ताव काफ़ी ताक़तवर हो सकता था और सुरक्षा परिषद बर्मा में परिवर्तन के लिए एक सख़्त बयान जारी कर सकती थी. बर्मा की सैनिक सरकार मनमाने तरीके से गिरफ़्तारियाँ, प्रताड़ना, बलात्कार और अपने ही लोगों को मार रही है." रायनयिकों का कहना है कि सुरक्षा परिषद में अब नए समीकरण बनते नज़र आ रहे हैं जब रूस और चीन एक साथ मिल गए हैं और दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया जैसे कुछ देशों ने भी उनका साथ दिया है और यह एकजुटता अमरीका और यूरोपीय देशों की प्रभाव रोकने के प्रयासों के तहत हुई है. | इससे जुड़ी ख़बरें बर्मा पर अमरीकी प्रस्ताव गिरा12 जनवरी, 2007 | पहला पन्ना बान ने महासचिव पद की शपथ ली14 दिसंबर, 2006 | पहला पन्ना बर्मा ने रेड क्रॉस के दफ़्तर 'बंद' किए27 नवंबर, 2006 | पहला पन्ना सुरक्षा परिषद में पहली बार बर्मा पर चर्चा29 सितंबर, 2006 | पहला पन्ना आंग सान सू ची की हिरासत बढ़ाई 27 मई, 2006 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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