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'अरब मीडिया में फ़ैसले की आलोचना' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सद्दाम हुसैन को मौत की सज़ा सुनाए जाने पर अरब मीडिया में तरह-तरह से राय प्रकट की गई है लेकिन अधिकतर में इस फ़ैसले की आलोचना की गई है. इनमें अल जज़ीरा टीवी चैनल भी शामिल है. वहीं लंदन स्थित एक अरबी अख़बार में लिखा गया है कि ख़ुशी मनाने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि सद्दाम हुसैन के बाद का इराक़ अधिक ख़तरनाक है. एक और अख़बार अल क़ुद्स अल अरबी के संपादकीय में लिखा गया है– इस मुक़दमे का लक्ष्य इराक़ के बारे में एक कपोल कल्पित छवि को बेचना था ताकि लोगों का ध्यान इस बात से अलग हटाया जा सके कि उनके देश पर किसी और का क़ब्ज़ा है. अरब जगत का एक और अख़बार है अल अरब अल आलमिया. ये लीबिया समर्थक अख़बार है और इस फ़ैसले पर कहता है कि इससे सद्दाम हुसैन अरब जगत में हीरो बन जाएँगे और अमरीका के ख़िलाफ़ नफ़रत बढ़ेगी. समर्थन मध्य पूर्व से प्रकाशित होनेवाले और अख़बार कहते हैं कि अगर किसी पर मुक़दमा चलना चाहिए तो वो चलना चाहिए इराक में अमरीका की अगुआई में जारी लड़ाई के ख़िलाफ़. लेकिन ऐसा नहीं है कि सद्दाम हुसैन के ख़िलाफ़ फ़ैसले की सिर्फ़ आलोचना ही की गई है. बग़दाद में सरकार समर्थक टीवी चैनल है अल अरबिया. उस पर तो बिल्कुल उत्सव का माहौल है और गाने बजाए जा रहे हैं. कुर्द और शिया समर्थक मीडिया में भी ख़ुशी प्रकट की गई है. यहाँ एक और दिलचस्प बात ये है कि इराक़ में सुन्नियों के समर्थक दो टीवी चैनल हैं उनको सरकार ने ये कहते हुए बंद कर दिया कि वे हिंसा भड़का रहे हैं. उधर मिस्र का एक अख़बार है अल वफ़्द ने फ़ैसले पर संतोष प्रकट करते हुए लिखा है- ठीक है कि किसी और देश का आपके देश पर क़ब्ज़ा करना ग़लत है मगर तानाशाही उससे भी अधिक ग़लत है क्योंकि इससे ये संभावना हमेशा बनी रहती है कि कोई और आपके देश पर क़ब्ज़ा कर सकता है. |
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