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ब्लेयर के 'जी का जंजाल' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ब्रिटेन में इनदिनों राजनीतिक माहौल काफ़ी गर्म है. ब्रितानी प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की अपनी लेबर पार्टी के लोग ही उनके लिए जी का जंजाल बन गए हैं. माँग एक ही है- टोनी ब्लेयर अपने पद से इस्तीफ़ा देने की तारीख़ तय करें. पिछले हफ़्ते ब्लेयर सरकार के कुछ लोगों ने अपनी माँग के समर्थन में इस्तीफ़ा तक दे दिया. जबाव में टोनी ब्लेयर ने ये ज़रूर कहा कि वे एक साल के भीतर अपने पद से हट जाएंगे. लेकिन निश्चित तिथि अब भी तय नहीं की है. टोनी ब्लेयर और उनके राजनीतिक विरोधी गॉर्डन ब्राउन (ब्रितानी वित्त मंत्री) के बीच मुलाकात भी हुई है लेकिन मामला शांत होने की बजाए गर्माता जा रहा है. कुर्सी के इस किस्से में अगर किसी को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँच रहा है तो वो ख़ुद लेबर पार्टी की छवि को. क्योंकि बतौर राजनेता टोनी ब्लेयर तो अपनी पारी लगभग खेल चुके हैं लेकिन पार्टी के लिए इसके दूरगामी परिणाम नुक़सानदेह हो सकते हैं. हालांकि अगला आम चुनाव अभी दूर है लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह सार्वजनिक तौर पर मतभेद सामने आने और राजनीतिक खींचतान का खामियाज़ा लेबर पार्टी को चुनाव में भुगतना पड़ सकता है. *********************************************** ऐतिहासिक धरोहर
कहते हैं कि वर्तमान को सँवारने के लिए अतीत को संजो कर रखना बेहद ज़रूरी होता है. यहाँ लंदन में ये बख़ूबी देखने को मिलता है. आज भी शहर के घरों, इमारतों की बनावट को पुराने स्वरुप में रखा गया है. इमारत के अंदर भले ही आलीशान होटल हो लेकिन बाहर से बनावट बिल्कुल वही होती है जो पुराने दौर में होती थी. ऐतिहासिक स्मारकों के रख रखाव पर यहाँ खा़सा ध्यान दिया जाता है. समय समय पर आपको मिलेगा कि किसी अहम स्मारक या इमारत को रख-रखाव के लिए पूरी तरह या आंशिक रुप से बंद कर दिया जाता है. अभी कुछ दिन पहले ही लंदन के मुख्य आकर्षण ट्रेफ़ाल्गर स्क्वेयर को आंशिक रुप से रख-रखाव के लिए ढक दिया गया था. और इसमें सबसे अच्छी बात ये लगी कि पूरा काम इतने सलीक़े से किया गया कि चौराहे के बाकी हिस्से में लोग रोज़ की तरह आते-जाते रहे और एक हिस्स में चुपचाप मरम्मत का काम भी हो गया- वो भी बेहद कम समय में. दिल्ली में इंडिया गेट की जो अहमियत है कुछ वैसी ही लंदन में ट्रेफ़ाल्गर स्क्वेयर की है. इसका डिज़ाइन चार्ल्स बैरी ने किया था और निर्माण कार्य 1840 में शुरु हुआ था जो पाँच साल तक चला. *********************************************** 'आइए-आइए'
लंदन डायरी के इस हिस्से में बात कुछ सैर सपाटे की लेकिन लंदन से दूर. लंदन में रहने का एक बड़ा फ़ायदा है कि ये शहर एक केंद्र बिंदु की तरह है जहाँ से आप यूरोप के आस-पास के देशों का भ्रमण आसानी से कर सकते हैं. लंदन से पेरिस तो आप सुबह जाकर शाम को लौट सकते हैं. सो पिछले महीने मैने भी पेरिस और स्विट्ज़रलैंड जाने का मन बनाया. पेरिस के मशहूर आईफ़ल टॉवर गई तो भाषा की बड़ी दिक्कत हुई. फ़्रेंच की तो एबीसी भी नहीं आती थी. टॉवर के गेट पर कुछ हैरान परेशान खड़ी थी कि वहाँ खड़े फ्रेंच गार्ड ने मुस्कुराते हुए स्वागत किया 'आइए-आइए' और बिन पूछे टिकिट दे दिया. मेरे पास जैसे इसका कोई जबाव नहीं था....बस यही सोचा कि लंदन जाकर इतना तो ज़रूर सीखूँगी कि धन्यवाद को फ़्रेंच में क्या कहते हैं. ख़ैर पेरिस से स्विट्ज़रलैंड गई तो सोचा कि यहाँ भी भाषा की समस्या से दो-चार होना पड़ेगा. लेकिन यहाँ पर्यटकों की सुविधा के लिए मुख्य पर्यटक स्थलों पर हिंदी समेत दुनिया की कुछ चुनिंदा भाषाओं में नोटिस बोर्ड लगे रहते हैं. सो जब यहाँ कि मशहूर टिटिल्स पहाड़ी पर गई तो जगह-जगह हिंदी में लिखे संदशों को देखकर मन बहुत खुश हुआ. स्थानीय लोगों से बात हुई तो उन्होंने बताया कि यहाँ आने वाले भारतीय पर्यटकों की संख्या इतनी ज़्यादा है कि कभी-कभी उन्हें लगता है कि मिनी इंडिया यहाँ बसता है और इसलिए पर्यटकों की सहूलियत के लिए हिंदी में संदेश लिखे गए हैं. और स्विट्ज़रलैंड के नज़ारों का तो कहना ही क्या!वाकई धरती के इस स्वर्ग को कुदरत ने बेशुमार ख़ूबसूरती बख़्शी है और इसे बयाँ करने के लिए शायद अलग से एक स्विट्ज़रलैंड डायरी लिखनी पड़ेगी. (हमारी साप्ताहिक लंदन डायरी का यह अंक आपको कैसा लगा? लिखिए hindi.letters@bbc.co.uk पर). |
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