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शनिवार, 09 सितंबर, 2006 को 19:14 GMT तक के समाचार
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इराक़ में ग़लत नीति का नतीजा

इराक़
इराक़ में हिंसा की घटनाओं में कोई कमी नहीं आई है
ग्यारह सितंबर के हमलों के बाद इराक़ युद्ध के लिए एक माहौल तैयार किया गया था. कहा गया था कि इराक़ का अल क़ायदा के साथ संबंध है और इराक़ के पास सामूहिक विनाश के हथियार भी हैं.

तर्क ये भी था कि दुनियाभर में जो आतंकवाद की घटनाएँ हो रही हैं, उसमें इराक़ का भी कहीं न कहीं योगदान है. लेकिन पाँच साल बाद ये बातें ग़लत साबित हो रही हैं.

हाल ही में अमरीका की सीनेट समिति ने भी स्कीवार किया है कि पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन का संबंध अल क़ायदा से नहीं था.

दरअसल इस पूरे क्षेत्र यानी मध्यपूर्व में अगर अल क़ायदा का कोई विरोधी था, वो सद्दाम हुसैन का इराक़ था. उस समय पूरे मध्यपूर्व में एक ऐसी सरकार थी, जो धर्मनिरपेक्ष सरकार थी.

अगर आप पूरे मध्य पूर्व में नज़र डालें तो यहाँ कोई सेक्यूलर सरकार नहीं बल्कि इस्लामी राष्ट्र हैं. आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध के नाम पर इराक़ पर हमला तो कर दिया गया लेकिन सारे तर्क अब ग़लत साबित हो रहे हैं.

सबक

इराक़ युद्ध अमरीकी प्रशासन के लिए बहुत बड़ा सबक है. कहा तो ये भी जाता है कि बेहतर होता अमरीका ईरान पर हमला कर देता क्योंकि यहाँ दुनिया को दिखाने के लिए उसके पास दो-चार ड्रम और दो-चार प्रयोगशालाएँ तो होतीं.

इराक़ युद्ध के कारण अमरीका की आलोचना बढ़ी है

आतंकवाद को ख़त्म करने के नाम पर अमरीका ने मध्यपूर्व में एक ऐसी सरकार को जन्म दिया जो फ़िलहाल तो उसके प्रभाव में है लेकिन उस पर ईरान के मुल्लाओं का असर भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

इराक़ में पिछले साल के मुक़ाबले हिंसा की घटनाओं में 24 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है. साथ ही आम लोगों के मारे जाने की घटना में 51 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है.

और तो और इराक़ युद्ध के बाद आतंकवादी घटनाओं की संख्या बढ़ी है. सोमालिया का ही उदाहरण देख लीजिए, जिनको अमरीका आतंकवादी कहता है, वो राजधानी मोगादीशू पर क़ब्ज़ा किए बैठे हैं और सरकार राजधानी से दूर बैठी है.

फ़लस्तीनी सरकार की कमान हमास के हाथ में है जिन्हें अमरीका आतंकवादी कहता है. लेकिन चुनाव में उसे दो तिहाई मत मिले जो कभी यासिर अराफ़ात की पार्टी को भी नहीं मिले थे.

ईरान में अहमदीनेजाद की जीत हुई और लेबनानी संसद में न सिर्फ़ हिज़्बुल्ला के सदस्य चुन कर गए बल्कि वे वहाँ की सरकार में भागीदार भी हैं.

इससे तो यही लगता है कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध के कारण उग्रवादी विचारधारा के लोगों को और बढ़ावा मिला है. क्योंकि कहीं ना कहीं ऐसी बात फैल रही है कि अमरीका का आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध इस्लाम के ख़िलाफ़ युद्ध बनकर रह गया है.

एक आँकड़े के मुताबिक़ वर्ष 2001 में पूरी दुनियाभर में आतंकवाद की सिर्फ़ तीन दर्जन घटनाएँ हुई थी, वो 2006 में बढ़कर साढ़े तीन से चार हज़ार के बीच तक हो गई है.

अगर इस आँकड़ें को ना भी माने तो अमरीकी विदेश मंत्रालय के मुताबिक़ वर्ष 2005 में साढ़े छह सौ आतंकवाद की घटनाएँ हुईं. इसका मतलब ये है कि वर्ष 2001 के मुक़ाबले इसमें पंद्रह गुना बढ़ोत्तरी हुई है.

 आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध के कारण उग्रवादी विचारधारा के लोगों को और बढ़ावा मिला है. क्योंकि कहीं ना कहीं ऐसी बात फैल रही है कि अमरीका का आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध इस्लाम के ख़िलाफ़ युद्ध बनकर रह गया है.

11 सितंबर की घटना की पूरे विश्व में निंदा हुई थी. मुस्लिम हों या अन्य धर्मों के लोग- सबने इसकी आलोचना की थी. हाँ कहीं-कहीं ख़ुशी भी मनाई गई थी.

लेकिन आम तौर पर इस हमले की आलोचना हुई थी. इसके बाद जब अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया तो इसका कई देशों ने समर्थन किया क्योंकि वे समझ रहे थे कि अमरीका के निशाने पर ओसामा बिन लादेन हैं.

और तो और तालेबान के सबसे बड़े समर्थक पाकिस्तान ने भी अमरीका का साथ दिया. लेकिन अमरीका रास्ते से भटक गया और राष्ट्रपति बुश ने तो यहाँ तक कह दिया कि उन्हें बड़ा काम करना है.

इस बड़े काम के चक्कर में लादेन को अभी तक पकड़ा नहीं जा सका है और वे बड़े आराम से मीडिया के ज़रिए, ऑडियो-वीडियो टेप के माध्यम से दुनियाभर में संदेश देते रहते हैं.

स्थिति तो ये है कि अफ़ग़ानिस्तान में हामिद करज़ई की सरकार काबुल के आठ किलोमीटर के दायरे वाली सरकार बन कर रह गई है और तालेबान विद्रोही फिर अपना सिर उठा रहे हैं.

अफ़ग़ानिस्तान युद्ध के समय जिस तरह अमरीका का समर्थन बढ़ा था, वही अमरीका की ग़लत नीतियों के कारण अब उसे समर्थन नहीं मिल रहा.

शिया-सुन्नी

वैसे तो सद्दाम हुसैन के शासनकाल में भी शिया-सुन्नी संघर्ष था. लेकिन हिंसा की छिटपुट घटनाएँ होती रहती थी. इस तरह की घटनाएँ तो भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में भी होती हैं.

शिया-सुन्नी संघर्ष बहुत बढ़ गया है

लेकिन जिस तरह शिया-सुन्नी हिंसा आज के इराक़ में हो रही है, वैसी हिंसा कभी भी इराक़ में नहीं हुई थी. बाथ पार्टी से पहले की सरकार के कार्यकाल में भी इतने बड़े पैमाने पर हिंसा नहीं हुई.

ये बातें कुछ हद तक सही हो सकती हैं कि सद्दाम हुसैन तानाशाह थे, क्रूर थे लेकिन अगर आप शांति व्यवस्था की बात करें, आम जनजीवन की बात करें, लोगों की सुरक्षा की बात करें- तो कहा जा सकता है कि सद्दाम हुसैन के शासनकाल में स्थितियाँ बेहतर थीं.

उस दौरान सऊदी अरब के बाद पूरे मध्यपूर्व में इराक़ में सबसे कम अपराध होते थे. लेकिन आज के इराक़ में एक-एक घटनाओं में सौ-सौ शियाओं और सौ-सौ सुन्नियों की जान जाती है.

अब तो अमरीका भी मानने लगा है कि इराक़ गृहयुद्ध की ओर अग्रसर है. यहाँ ना सिर्फ़ शिया-सुन्नी बल्कि अरब और कुर्द का भी झगड़ा हो रहा है.

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