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शुक्रवार, 28 जुलाई, 2006 को 14:51 GMT तक के समाचार
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इतिहास बदलने वाला स्वेज़ नहर संकट-2

स्वेज़ नहर संकट
स्वेज़ नहर संकट ने दुनिया की राजनीति की दिशा ही बदल दी थी
स्वेज़ नहर का ये खारा पानी 1869 से ही बह रहा है, दिन रात इससे होकर गुज़रने वाले जहाज़ों ने न जाने कितनी लहरें पैदा की हैं. लेकिन इस पानी ने केवल पचास सालों में मौजूदा दौर के इतिहास में जितने हिलकोरे उठाएं हैं उन्हें गिनना भी कोई कम दुरूह नहीं है.

शुरूआत हुई थी 1956 में मिस्र के राष्ट्रपति जमाल अब्दुल नासिर के उस ऐलान से जिसमें स्वेज़ नहर के राष्ट्रीयकरण की घोषणा की गई.

एक सीधी ललकार पश्चिमी ताक़त को, उनसे, जिन्हें वो हिकारत से अरब कहा करते थे. ब्रिटेन, फ़्रांस, इसराइल तीनों ने मिलकर हमला बोला लेकिन कुछ अमरीका की मदद और कुछ नासिर का जुझारूपन, उन्हें मुँह की खानी पड़ी.

ब्रिटेन के साम्राज्य का एक मायने में सूर्यास्त हुआ. कहते हैं उसके बाद ब्रिटेन के किसी प्रधानमंत्री ने अमरीका के ख़िलाफ़ कृदम नहीं उठाया.

अरब जगत में मानो एक नई जान आ गई. राजनीति विज्ञान के जानकार प्रोफ़ेसर मुमताज़ अहमद उन दिनों को कुछ ऐसे याद करते हैं.

"नए-नए देश आज़ाद हो रहे थे, साम्राज्यवाद का युग दम तोड़ रहा था और तीसरी दुनिया के लोगों में कुछ कर दिखाने का जज़्बा भी था. ऐसे में जमाल अब्दुल नासिर जैसा नेता उठता है और ब्रितानी और फ्रेंच साम्राज्यवाद पर भरपूर वार करता है, उसने न सिर्फ़ अरबों को बल्कि तीसरी दुनिया के लोगों में जैसे करंट सा भर दिया."

करंट भर दिया था...
 नए-नए देश आज़ाद हो रहे थे, साम्राज्यवाद का युग दम तोड़ रहा था और तीसरी दुनिया के लोगों में कुछ कर दिखाने का जज़्बा भी था. ऐसे में जमाल अब्दुल नासिर जैसा नेता उठता है और ब्रितानी और फ्रेंच साम्राज्यवाद पर भरपूर वार करता है, उसने न सिर्फ़ अरबों को बल्कि तीसरी दुनिया के लोगों में जैसे करंट सा भर दिया.
प्रोफ़ेसर मुमताज़ अहमद

मुमताज़ अहमद याद करते हुए बताते हैं कि जब काहिरा के सौतल अरब रेडियो पर नासिर की आवाज़ गूंजती थी तो हर अरब के दिल की धड़कन बन जाती थी.

मोरोक्को से लेकर खाड़ी तक एक राष्ट्र, अरब राष्ट्र, अबतक एक सोच थी अब अचानक लोगों को लग रहा था कि वो हासिल हो सकता है.

ठीक दो साल बाद नासिर ने सीरिया के साथ मिलकर संयुक्त अरब गणराज्य बनाया. इराक़ में ब्रिटिश साम्राज्य की वफ़ादार राजशाही को वहीं के कुछ सैन्य अधिकारियों ने गद्दी से उतार दिया और कुछ ही समय बाद सद्दाम हुसैन के नेतृत्व वाली बाथ पार्टी का राज शुरू हुआ.

अरब राजनीति के अब तीन मूलमंत्र थे---अरबवाद, सामाजिक न्याय और इसराइल का ख़ात्मा.

लेकिन स्वेज़ नहर की लड़ाई में इसराइल भले ही पीछे हटा हो, इस लड़ाई ने उसे एक सैनिक ताक़त के रूप में स्थापित किया. साथ ही अमरीका के लिए भी मध्यपूर्व का रास्ता खुला.

बल्कि अमरीकी राष्ट्रपति ने तो ये भी घोषणा कर दी कि मध्यपूर्व में कम्यूनिस्टों के प्रभाव को रोकने के लिए अमरीका मध्यपूर्व को आर्थिक और सैनिक मदद देगा और ज़रूरत पड़ी तो सैनिक ताक़त का भी इस्तेमाल करेगा. लेकिन इसके बावजूद रूस की पैठ भी मध्यपूर्व में बढ़ी.

गुटनिर्पेक्ष आंदोलन की नींव

भारत की आज़ादी को भी ज़्यादा दिन नहीं हुए थे. स्वेज़ संकट के बाद की राजनीति का उसपर क्या प्रभाव पडा?

गुटनिर्पेक्ष आंदोलन...
 स्वेज़ नहर संकट के बाद तटस्थ देशों और पूर्वी अफ्रीकी देशों का पश्चिमी देशों के साथ फ़ासला और बढ़ गया और यहीं से गुटनिर्पेक्ष आंदोलन काफ़ी मज़बूत होकर उभरा.
प्रोफ़ेसर इफ़्तेख़ार मलिक

अंतरराष्ट्रीय इतिहास के जानकार प्रोफ़ेसर इफ़्तिकार मलिक कहते हैं, "बहुत बड़ा असर पड़ा था. भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टीटो और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकार्णो मिस्र के राष्ट्रपति जमाल अब्दुल नासिर के साथ मिलकर तटस्थता का रास्ता अपनाया कि हम न तो पूर्व के साथ ज़्यादा मिलना चाहते हैं और न ही पश्चिम के साथ."

इफ़्तेख़ार मलिक कहते हैं कि स्वेज़ नहर संकट के बाद तटस्थ देशों और पूर्वी अफ्रीकी देशों का पश्चिमी देशों के साथ फ़ासला और बढ़ गया और यहीं से गुटनिरपेक्ष आंदोलन काफ़ी मज़बूत होकर उभरा.

तो स्वेज़ संकट के बाद दुनिया की राजनीति तो बदली ही, कई लोग ये भी मानते हैं कि आज की दुनिया में जो हो रहा है उसपर भी स्वेज़ की छाया कहीं न कहीं ज़रूर है.

ब्रिटेन के जानेमाने राजनीतिज्ञ टोनी बेन कहते हैं कि इराक़ युद्ध एक जीता जागता उदाहरण है.

"इराक़ पर हमला करने के लिए तर्क दिए गए वे पूरी तरह धोखाधड़ी थे, बात की गई थी सद्दाम हुसैन के पास महाविनाश के हथियार होने की. यानी इस मामले में संभावित युद्ध रोकने के लिए युद्ध किया गया. जो ग़लत तरीके हमने उस समय इस्तेमाल किए थे वही अब भी किए. संसद को तब भी ग़लत जानकारी दी गई थी और अब भी."

तब और अब...
 सर एंथनी इडेन जिस तरह मिस्र के राष्ट्रपति जमाल अब्दुल नासिर को देखते थे मुसोलिनी और हिटलर के रूप में, इसी तरह प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने भी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को हिटलर और मुसोलिनी के रूप में पेश किया.
प्रोफ़ेसर मुमताज़ अहमद

तो क्या ब्रिटेन के आज के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर और 1956 के प्रधानमंत्री ऐंथनी इडेन की तुलना की जा सकती है.

प्रोफ़ेसर मुमताज़ अहमद कहते हैं, "सर एंथनी इडेन जिस तरह मिस्र के राष्ट्रपति जमाल अब्दुल नासिर को देखते थे मुसोलिनी और हिटलर के रूप में, इसी तरह प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने भी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को हिटलर और मुसोलिनी के रूप में पेश किया."

लेकिन प्रोफ़ेसर मुमताज़ अहमद साथ ही ये भी कहते हैं कि जहाँ एंथनी इडेन को ब्रिटेन का सबसे असफल प्रधानमंत्री कहा जाता है, टोनी ब्लेयर इराक़ युद्द के बाद का भी चुनाव जीत चुके हैं.

ब्रिटिश साम्राज्य अब फिर शायद कभी नहीं क़ायम होगा, अरब राष्ट्रवाद का सपना कहीं गुम हो चुका है, मध्यपूर्व इतना निराश और बदहाल कभी नहीं दिखा...... बस स्वेज़ नहर का पानी अभी भी उसी गति से बह रहा है.

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