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टोनी ब्लेयर का मध्य पूर्व मिशन! | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ब्रितानी प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश से बातचीत के लिए शुक्रवार को वाशिंगटन पहुँचे और मध्य-पूर्व संकट पर संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव पर सहमति बनाने के तरीक़ों पर विचार किया. पत्रकारों को तो यही बताया गया कि ब्रितानी प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर यह संदेश लेकर व्हाइट हाउस गए कि लेबनान में हो रही लड़ाई को जल्द से जल्द रूकवाना ज़रूरी है. इसका यह मतलब क़तई नहीं कि प्रधानमंत्री ब्लेयर इस बात से सहमत हो गए हैं कि लड़ाई रूकनी चाहिए, बल्कि उन्हें इस बात की चिंता सता रही है कि उनकी छवि को बहुत नुक़सान हो रहा है. ब्रिटेन में और दुनिया भर में यही समझा जा रहा है कि राष्ट्रपति बुश और प्रधानमंत्री ब्लेयर ने इसराइल को हरी झंडी दिखा दी है कि वे लेबनान में जितने चाहे हमले करें और चाहे जितनी भी मासूम जानें जाएँ. दरअसल, इसराइल के न्याय मंत्री ने कूटनीनिक कोशिशों के नाकाम होने के बाद कहा था कि रोम में युद्धविराम पर सहमति नहीं होने का मतलब यही है कि दुनिया के देश इसराइल के हमलों को जारी रहने देना चाहते हैं. टोनी ब्लेयर को आशा है कि वे राष्ट्रपति बुश को संयुक्त राष्ट्र के एक प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए राज़ी कर लेंगे जो कि अगले सप्ताह आने वाला है. इस प्रस्ताव में यही कहा जाएगा कि लेबनान में अंतरराष्ट्रीय शांति सेना तैनात की जाए, हिज़बुल्ला से हथियार डलवाया जाए और दोनों तरफ़ से बंदियों की रिहाई कराई जाए. टोनी ब्लेयर का मानना है कि अगर ऐसे क़दम उठाए गए तभी दोनों पक्षों को लड़ाई बंद करने पर राज़ी किया जा सकेगा. टोनी ब्लेयर और बुश यह नहीं चाहेंगे कि इस मामले पर उनके बीच किसी तरह की दरार दिखाई दे. इस बीच अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस मध्य पूर्व लौटने वाली हैं. जब से ये हमले शुरू हुए हैं तब से लेकर अब तक किसी पक्ष के रूख़ में कोई बदलाव नहीं आया है. अमरीकी राष्ट्रपति ने बुश ने एक बार फिर पुरानी बात दोहराई है कि युद्धविराम टिकाऊ होना चाहिए, उनके कहने का मतलब यही है कि हिज़बुल्ला की ताक़त ख़त्म हुए बिना कोई युद्धविराम स्थायी नहीं हो सकता. लेकिन टोनी ब्लेयर की ही तरह बुश को भी एहसास हो रहा है कि विश्व जनमत इसराइल से अमरीका और ब्रिटेन की नज़दीकी की वजह से उनसे नाराज़ होता जा रहा है, यही वजह है कि उन्होंने जान-माल के नुक़सान पर गहरा दुख प्रकट किया है. यह साफ़ दिखाई देने लगा है कि अमरीका के ऊपर उसके साझीदार देशों का ज़ोरदार दबाव है कि युद्धविराम हो. रोम में हुई बैठक के बाद से अमरीका और ब्रिटेन को इस बात का आभास हो गया है कि दुनिया भर में उन्हें भी इस संघर्ष के जारी रहने के लिए ज़िम्मेदार माना जा रहा है. यही वजह है कि कूटनीतिक प्रयासों में थोडी़ तेज़ी दिख रही है लेकिन यह मान लेना जल्दबाज़ी होगी कि युद्धविराम की संभावनाएँ बन रही हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें इसराइल के दावे से अमरीका नाराज़28 जुलाई, 2006 | पहला पन्ना 'इसराइली बमबारी में 600 मारे गए'27 जुलाई, 2006 | पहला पन्ना लेबनान से सैनिक हटाएगा ऑस्ट्रेलिया27 जुलाई, 2006 | पहला पन्ना अन्नान का तुरंत युद्धविराम का आग्रह26 जुलाई, 2006 | पहला पन्ना इसराइली हमलों में पर्यवेक्षकों की मौत25 जुलाई, 2006 | पहला पन्ना इसराइल शांतिबलों की तैनाती पर सहमत24 जुलाई, 2006 | पहला पन्ना इसराइल को अमरीकी बमों की खेप22 जुलाई, 2006 | पहला पन्ना इसराइली बल प्रयोग के क़ानूनी पहलू20 जुलाई, 2006 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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