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गुरुवार, 08 जून, 2006 को 11:46 GMT तक के समाचार
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कई देशों में सक्रिय रहे ज़रक़ावी
अबू मुसाब अल ज़रक़ावी
ज़रक़ावी पर बहुत से हमलों के आरोप थे
अबू मुसाब अल-ज़रक़ावी को इराक़ का सबसे कुख्यात चरमपंथी कहा जाता था हालाँकि ज़रक़ावी के बारे में ज़्यादा जानकारी कभी भी सामने नहीं आ पाई.

मीडिया में उनकी छवि उनके दुश्मनों और समर्थकों से मिली सूचनाओं के आधार पर ही बनी है.

बम धमाकों, हत्याओं और विदेशी बंधकों के सिर कलम करने की अनेक घटनाओं में उनकी सीधी भागीदारी मानी जाती रही है.

अमरीका ने ज़रक़ावी के सिर पर ढाई करोड़ डॉलर का इनाम घोषित कर रखा था. उल्लेखनीय है कि अमरीका ने अल क़ायदा के शीर्ष नेता ओसामा बिन लादेन पर इतना ही इनाम घोषित किया है.

जॉर्डन में पैदा हुए ज़रक़ावी इराक़ में पहली बार चरमपंथी संगठन तौहीद और जिहाद के नेता के रूप में सामने आए.

उन्होंने 2004 में अपने संगठन का विलय ओसामा बिन लादेन के अल-क़ायदा में कर दिया.

कई विश्लेषकों का मानना है कि ज़रक़ावी ने अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए इराक़ में चरमपंथी हिंसा का सहारा लिया, वहीं विश्लेषकों का एक वर्ग यह मानने वालों का भी है कि ज़रक़ावी के असर को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता रहा है.

ज़रक़ावी और अल क़ायदा

इराक़ पर हमला होने से पहले फ़रवरी 2003 में अमरीकी विदेशमंत्री कॉलिन पॉवेल ने संयुक्त राष्ट्र से कहा था कि कि ज़रक़ावी ओसामा बिन लादेन के एक निकट सहयोगी रह चुके हैं और उन्होंने इराक़ में पनाह ले ली है.

ख़ुफ़िया सूचनाओं में संकेत दिया गया था कि ज़रक़ावी बग़दाद में थे और पॉवेल के अनुसार सद्दाम हुसैन ने अल क़ायदा को संरक्षण दिया हुआ था इसलिए उनके मुताबिक़ इराक़ पर हमला करना सही है.

लेकिन कुछ विश्लेषकों ने अमरीका के इस दावे को ग़लत बताते हुए कहा कि ज़रक़ावी की तो ओसामा बिन लादेन से दुश्मनी रही है.

अल ज़रक़ावी का पोस्टर

हालांकि दोनों को अफ़ग़ानिस्तान में नाम मिला जहाँ उन्होंने 1980 के दशक में वहाँ सोवियत संघ की सेनाओं के ख़िलाफ़ 'जिहाद' में हिस्सा लिया.

ज़रक़ावी के बारे में कहा जाता है कि वह जॉर्डन में एक ऐसे युवक के रूप में जाने जाते थे जो सीधा-सादा था और उसे ग़ुस्सा जल्दी आता था.

अफ़ग़ानिस्तान से सोवियत सेनाएँ बाहर निकलने के बाद ज़रक़ावी विद्रोही इस्लामी तेवरों के साथ जॉर्डन लौटे थे.

जॉर्डन में राजतंत्र को उखाड़ने की कोशिश करने के आरोप में ज़रक़ावी को सात साल की क़ैद हुई और क़ैद से छूटने के कुछ ही दिन बाद वह देश से बाहर भाग गए.

अमरीकी और इसराइली पर्यटकों पर हमलों की कथित योजना बनाने के आरोप में ज़रक़ावी पर जॉर्डन में उनकी ग़ैरहाज़िरी में ही मुक़दमा चला और उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई.

पलायन

कुछ पश्चिमी देशों की ख़ुफ़िया सूचनाओं के अनुसार ज़रक़ावी ने यूरोप में पनाह लेने की कोशिश की थी.

जर्मनी के सुरक्षा बलों ने एक ऐसे चरमपंथी गुट का पता भी लगाया जिसके बारे में कहा गया कि ज़रक़ावी उसके नेता हैं.

बाद में पता चला कि ज़रक़ावी ने एक बार फिर अफ़गानिस्तान की तरफ़ रुख़ किया और वहाँ कुछ चरमपंथी प्रशिक्षण शिविर भी चलाए थे.

कहा जाता है कि 2001 में अफ़ग़ानिस्तान में एक अमरीकी मिसाइल हमले के बाद वह इराक़ का रुख़ किया.

अमरीकी अधिकारियों का तर्क है कि ज़रक़ावी अल क़ायदा के कहने पर ही इराक़ पहुँचे और वहाँ उन्होंने पहले एक कुर्द संगठन अंसार अल आलम के साथ गठजोड़ किया.

साम्प्रदायिक रणनीति

अक्टूबर 2002 में ज़रक़ावी पर अम्मान में अमरीकी सहायताकर्मी लॉरेंस फ़ोली की हत्या का आरोप लगा.

इसके कुछ महीनों बाद 2003 में उनको कासाब्लांका और इस्तांबुल समेत कई जगह बम धमाके कराने का आरोप लगाया गया.

लेकिन माना जाता है उनकी सर्वाधिक सक्रियता इराक़ में ही देखी गई.

अमरीकियों द्वारा फ़रवरी 2004 में जारी ज़रक़ावी के एक पत्र से साफ होता है कि इराक़ में उनकी मुख्य रणनीति शियाओं को निशाना बनाने की थी.

पत्र से यह भी स्पष्ट होता है कि ज़रक़ावी अमरीकी उपस्थिति को डंवाडोल करने के लिए इराक़ में साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने के पक्ष में थे.

अमरीकी सेना ने पिछले साल एक कार्रवाई में ज़रक़ावी को घायल करने का दावा किया था. अल क़ायदा ने भी इसकी पुष्टि की थी, हालांकि ज़रक़ावी को लगी चोट मामूली ही बताई गई थी.

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