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गुरुवार, 08 जून, 2006 को 12:40 GMT तक के समाचार
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ज़रक़ावी की मौत के बाद?

अबू मुसाब अल ज़रक़ावी
ज़रक़ावी पर बहुत से हमलों के आरोप थे
अबू मुसाब अल ज़रक़ावी को मारना नई इराक़ी सरकार और अमरीका के लिए एक बड़ी कामयाबी है लेकिन इस सवाल के जवाब के लिए अभी इंतज़ार करना होगा कि ज़रक़ावी की मौत क्या इराक़ में विद्रोही गतिविधियों की समाप्ति की शुरूआत है.

ज़रक़ावी की मौत से इराक़ में अल क़ायदा के नेटवर्क को एक बड़ा झटका लगा है और इसके बाद इराक़ी सरकार और विद्रोहियों के बीच संपर्क का रास्ता भी खुल सकता है.

इराक़ी विद्रोही इस्लामी कट्टरपंथी होने के बजाय राष्ट्रवादी हैं.

हो सकता है कि ज़रक़ावी की मौत के बाद इराक़ में शिया और सुन्नियों के बीच संबंध कुछ बेहतर हो जाएँ क्योंकि ज़रक़ावी को शियाओं का विरोधी माना जाता था.

हालाँकि सिर्फ़ एक व्यक्ति की मौत से यह ज़रूरी भी नहीं समझ लेना चाहिए कि हालात में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाएंगे.

बदले का विस्फोट

दिसंबर 2003 में जब सद्दाम हुसैन को पकड़ा गया था तो उस समय जो हो-हल्ला हुआ था वो शायद लोगों को अब भी याद होगा.

उस समय अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कहा था, "उम्मीदों से भरपूर दिन आ गया है, सभी इराक़ी अब एकजुट होकर हिंसा को नकार सकते हैं और एक नए इराक़ के निर्माण में जुट सकते हैं."

अबू मुसाब अल ज़रक़ावी

जॉर्ज बुश के एक नज़दीकी सहयोगी ब्रितानी प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने भी कुछ इसी तरह की बात कही थी, "उम्मीद है कि सद्दाम हुसैन की गिरफ़्तारी के बाद अब इराक़ी लोगों में एकता, सुलह-सफ़ाई और शांति आएगी."

लेकिन जैसाकि हम सबने देखा है, ऐसा नहीं हो सका और ज़रक़ावी की मौत के बाद भी न तो अल क़ायदा के सदस्य और न ही राष्ट्रवादी इराक़ी अपना रास्ता छोड़ेंगे.

उल्टे, यह भी हो सकता है कि ज़रक़ावी के समर्थकों में बदले की विस्फोटक भावना और भड़क जाए है.

राष्ट्रवादी इराक़ियों को बातचीत और राजनीति में शामिल करना एक मुश्किल काम होगा क्योंकि उनकी लंबी मांग रही है कि इराक़ से अमरीकी सैनिक यथाशीघ्र निकल जाएँ.

मौजूदा इराक़ी सरकार और उसके सुरक्षा बल अभी इतने मज़बूत नहीं हुए हैं कि वे अकेले सुरक्षा की ज़िम्मेदारी संभाल सकें.

शियाओं का दुश्मन

हाँ उम्मीद की एक किरण इस रूप में नज़र आती है कि ज़रक़ावी शिया-सुन्नी संघर्ष की हिमायत करते थे. ग़ौरतलब है कि ज़रक़ावी ख़ुद सुन्नी थे और शियाओं को दुश्मन मानते थे.

हाल ही में एक ऑडियो टेप में बोलने वाले व्यक्ति ने ख़ुद को ज़रक़ावी बताते हुए शियाओं को विदेशी सेनाओं का सहयोगी बताया था और उनके साथ किसी सुलह-सफ़ाई की संभावना को ख़ारिज किया था.

अब ज़रक़ावी की मौत के बाद शियाओं और सुन्नियों के बीच सुलह-सफ़ाई की ज़्यादा संभावना हो सकती है. ग़ौरतलब है कि हाल के महीनों में शिया-सुन्नी हिंसा में बहुत से लोग मारे गए हैं.

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इराक़ में गृहयुद्ध शुरू हो चुका है, हालाँकि कुछ ऐसा नहीं मानते लेकिन जो भी कहा जाए, यह तो सच है कि बहुत से लोग मारे जा रहे हैं.

ज़रक़ावी किस-किस नुक़सान के लिए किस हद तक ज़िम्मेदार थे, यह अनुमान लगाना मुश्किल है.

हालाँकि यह काफ़ी संभावना है कि नेतृत्व, रणनीति और प्रेरणा की बात की जाए तो उनका विद्रोहियों पर काफ़ी असर था. और यह भी सही है कि वह अपने गुट में सिर्फ़ अकेले नहीं थे.

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