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शुक्रवार, 05 मई, 2006 को 13:24 GMT तक के समाचार
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'दारफ़ुर विद्रोही समझौते के लिए राज़ी'
वार्ताकार
वार्ताकारों को उम्मीद है कि मिन्नावी अन्य दो गुटों को भी मना लेंगे
अफ़्रीकी वार्ताकारों के मुताबिक दारफ़ुर के सबसे बड़े विद्रोही गुट और सूडान सरकार के बीच शांति समझौते पर सहमति बन गई है.

वार्ताकारों के अनुसार सूड़ान के दारफ़ुर इलाक़े में सबसे बड़ा विद्रोही गुट एसएलएम यानि सूडानिज़ लिबरेशन मूवमेंट सरकार के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार हो गया है. लेकिन दो छोटे विद्रोही गुटों ने कहा है कि वे समझौते से खुश नहीं है.

एसएलएम गुट के नेता मिन्नी मिन्नावी के शांति वार्ता में वापस आने के बाद ही शांति समझौते पर प्रगति हो पाई.

अंतरराष्ट्रीय वार्ताकारों का कहना है कि दारफ़ुर में शांति स्थापना के लिए ये समझौता अहम है. नाइजीरिया की राजधानी अबूजा में हो रही इस शांति वार्ता में मौजूद बीबीसी संवाददाता का कहना है कि जब मिन्नी मिन्नावी बातचीत के लिए वापस लौटे तो तालियाँ से उनका स्वागत किया गया.

उन्होंने कहा," सत्ता में भागीदारी को लेकर कुछ मतभेद हैं लेकिन मैं समझौते के दस्तावेज़ को स्वीकार करता हूँ."

असहमति

मिन्नी मिन्नावी के एक अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि एसएलएम संसद में और सीटें चाहता है लेकिन दारफ़ुर विवाद के अंत के लिए गुट समझौते पर सहमत हो गया है.

लेकिन दारफ़ुर के सबसे छोटे विद्रोही गुट जेम यानि जस्टिस एंड इक्वैलिटी मूवमेंट का कहना है कि वो समझौते में कुछ बदलाव चाहता है. इस गुट के मुख्य वार्ताकार ने कहा कि वे सूडान सरकार में उप राष्ट्रपति का पद और राष्ट्रीय धन में ज़्यादा हिस्सेदारी चाहते हैं.

इस गुट के वार्ताकार ने कहा कि जब तक ये बदलाव नहीं किए जाते वे समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे.

वैसे एसएलएम भी समझौते को लेकर एकमत नहीं है. इसका एक छोटा धड़ा समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए राज़ी नहीं है.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि मध्यस्थों को उम्मीद है कि मिन्नावी दूसरे विद्रोही गुटों को मनाने में कामयाब हो जाएँगे. मध्यस्थ कह चुके हैं कि तीन साल पुराने दारफ़ुर विवाद को सुलझाने का ये आख़िरी प्रयास है. इस विवाद के चलते करीब दो लाख लोगों की जान जा चुकी है और करीब बीस लाख लोग बेघर हो चुके हैं.

विद्रोहियों का आरोप था कि सूडान सरकार दारफ़ुर के अफ़्रीकी लोगों के साथ भेदभाव करती है. विद्रोहियों ने वर्ष 2003 में हथियार उठाए थे.

इसके बाद सरकार समर्थक अरब मिलिशिया ने बड़े पैमाने पर अभियान शुरू किया जिसे अमरीका ने 'नरसंहार' की संज्ञा दी थी.

सूड़ान सरकार मिलिशिया का समर्थन करने की बात से इनकार करती रही है.

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