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मंगलवार, 21 फ़रवरी, 2006 को 01:34 GMT तक के समाचार
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इराक़ को अमरीका की दो टूक चेतावनी
बग़दाद
इराक़ में पिछले दिनों हिंसा की घटनाएँ बढ़ी हैं
अमरीका ने इराक़ के राजनीतिज्ञों को दो टूक चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि वहाँ सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाली सरकार न बनी तो अमरीका राजनीतिक और आर्थिक सहायता जारी नहीं रखा पाएगा.

इराक़ में अमरीकी राजदूत ज़ल्मे ख़लीलज़ाद ने इराक़ में बढ़ते जा रहे क्षेत्रवाद और साम्प्रदायवाद के प्रति चिंता जताते हुए कहा है कि सरकार ऐसी होनी चाहिए जो इराक़ी जनता का प्रतिनिधित्व करे.

अमरीकी राजदूत की इस टिप्पणी को इराक़ की राजनीतिक और सुरक्षा स्थिति को लेकर बढ़ती अमरीकी झुंझलाहट के रुप में देखा जा रहा है.

पिछले दिनों एक बार फिर विभिन्न समुदायों के बीच हिंसा बढ़ी है और चुनाव हुए दो महीने बीत चुके हैं मगर सरकार गठन की कोशिशों में अगर प्रगति देखी जाए तो वो बहुत ही मामूली है.

नई संसद की बैठक इस सप्ताह होनी है और ख़लीलज़ाद इस बयान के ज़रिए शायद ये कोशिश कर रहे हैं कि आने वाले सांसदों का इसके बाद सरकार बनाने पर ही ध्यान केंद्रित रखने में वो सफल हो जाएँगे.

चिंता

वैसे शायद ख़लीलज़ाद की चिंता इस बात को लेकर और भी है कि नई सरकार में रक्षा और गृह मंत्रालय किसे दिए जाएँगे.

ख़लीलज़ाद
ख़लीलज़ाद के बयान को अमरीकी कूटनीति से जोड़कर देखा जा रहा है

ये दोनों ही काफ़ी संवेदनशील मंत्रालय हैं, फिर वो चाहे विद्रोह से निबटने का मामला हो या क़ानून व्यवस्था बनाए रखने का.

शायद इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने सख़्त संदेश भी दिया, " हम अमरीकी जनता के संसाधन ऐसी फ़ौजें बनाने में नहीं लगाने वाले हैं जो सामुदायिक हिंसा में लगी हो और जिन पर इराक़ी लोग भरोसा भी नहीं कर सकें."

मौजूदा गृह मंत्री बयाँ जब्र प्रमुख शिया गठबंधन के सदस्य हैं और उनका ज़ोर है कि ये मंत्रालय उन्हीं के गठबंधन के पास रहना चाहिए जबकि सुन्नी नेताओं की माँग है कि जब्र से ये पद ले लिया जाए.

उनका आरोप है कि जो आत्मघाती दस्ते सुन्नियों के विरुद्ध काम कर रहे हैं जब्र उनसे जुड़े हैं.

गृह मंत्रालय तो इस बात से इनकार ही करता रहा है कि वह किसी भी तरह से सुन्नियों को निशाना बना रहा है, मगर सुन्नियों के लिए इस पर भरोसा करना मुश्किल साबित हो रहा है.

दबाव

आमतौर पर अमरीकी कूटनीति सार्वजनिक रुप से कार्य नहीं करती लेकिन अमरीकी राजदूत ने जिस तरह से बयान दिया है उससे स्पष्ट है कि अमरीका इराक़ के राजनीतिज्ञों और जनता दोनों को साफ़ तौर पर चेतावनी देना चाहता है.

दरअसल अमरीकी विदेश नीति पर इससे अधिक दबाव कभी नहीं रहा होगा जितना इस समय है.

हालांकि अमरीकी राजदूत ने किसी समूह या समुदाय का नाम नहीं लिया लेकिन यह स्पष्ट दिखता है कि शिया नेता उनके निशाने पर हैं.

 हमने यहाँ काफ़ी ख़ून बहाया है धन लगाया है. हम इराक़ की सफलता को अपनी सफलता और विफलता को अपनी विफलता मानेंगे
ज़ल्मे ख़लीलज़ाद

पिछले साल के अंत में हुए चुनाव के बाद जब शिया बहुमत के साथ जीतकर आए तब से उन पर दबाव बना हुआ है कि वे एक राष्ट्रीय सरकार बनाने के लिए कुर्द और सुन्नियों को साथ लेकर चलें.

इससे पहले अमरीका इब्राहिम जाफ़री के प्रधानमंत्री चुने जाने से बहुत ख़ुश नहीं था जिन्हें क़ाबायली नेता मुक़्तदा अस सद्र का भी समर्थन मिला हुआ है.

बीबीसी के संवाददाता रॉब वाटसन का कहना है कि अमरीका की उम्मीद अभी ख़त्म नहीं हुई है इसीलिए राजदूत की ओर से ये चेतावनी जारी की गई है.

इसीलिए इस बयान के साथ अमरीका ने अपनी प्रतिबद्धता के बात भी दोहराई है. राजदूत ने कहा, "हमने यहाँ काफ़ी ख़ून बहाया है धन लगाया है. हम इराक़ की सफलता को अपनी सफलता और विफलता को अपनी विफलता मानेंगे."

महाविनाश के हथियार न मिलने के बाद अमरीका पर ये दबाव तो बना ही हुआ है कि वो इराक़ में स्थाई और स्थिर प्रजातंत्र की स्थापना करे.

इस बीच ब्रितानी विदेश मंत्री जैक स्ट्रॉ ने सिर्फ़ डेढ़ महीने के भीतर दूसरी बार इराक़ की यात्रा की है. माना जा रहा है कि वो सरकार गठन पर चर्चा के लिए देश के प्रमुख नेताओं से मिलेंगे.

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