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'सूनामी प्रभावितों को अपर्याप्त सहायता' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सहायता एजेंसियों ने सूनामी से प्रभावित पाँच देशों की सरकारों पर आरोप लगाया है कि वे प्रभावित लोगों को घर, पर्याप्त राहत और काम उपलब्ध कराने में असफल रहीं हैं. संयुक्त राष्ट्र के लिए कल्याणकारी संस्था एक्शन एड् और दो अन्य संस्थाओं ने एक रिपोर्ट तैयार की है जिसमें कहा गया है कि तटवर्ती इलाक़ों में रहनेवाले लोगों को वापस लौटने से हतोत्साहित किया गया या फिर रोका गया. इस रिपोर्ट को तैयार करनेवाले लोगों ने भारत, श्रीलंका, इंडोनेशिया, मालद्वीव और थाइलैंड की यात्रा की और लगभग 50 हज़ार लोगों से बातचीत की. इस रिपोर्ट को संयुक्त राष्ट्र के न्यूयॉर्क स्थित मुख्यालय में जारी किया गया है. सूनामी की त्रासदी पर अंतरराष्ट्रीय जगत में भारी प्रतिक्रिया हुई थी और बड़े पैमाने पर सरकारों और लोगों ने राहत कार्यों के लिए सहायता दी थी. रिपोर्ट में कहा गया है कि अभूतपूर्व राहत कार्य के बावजूद प्रभावित पाँचों देशों का प्रशासन कमज़ोर समुदायों की मदद करने में असफल रहा. रिपोर्ट में कहा गया है कि व्यापारिक हितों के कारण तटवर्ती इलाक़ों में रहनेवाले लोगों की अनदेखी की गई. 'जबरन हटाया' इसमें भारत के आंध्र प्रदेश राज्य का उल्लेख किया गया है और कहा गया है कि वहाँ ग्रामीणों को जबरन अपने घरों से हटाया गया ताकि वहाँ पर्यटन स्थल बनाए जा सकें. रिपोर्ट के अनुसार श्रीलंका के तटवर्ती इलाक़ों में रहनेवाले लोगों का कहना है कि उन्हें पता नहीं कि वे कभी अपने घरों की मरम्मत कर भी पाएँगे या नहीं. सहायता एजेंसियों ने पाया कि बड़ी संख्या में लोग भीड़भाड़ वाले अस्थाई शिविरों में रह रहे हैं. इंडोनेशिया में आचे और मालद्वीव की महिलाओं ने बताया कि रहने की ख़राब परिस्थितियों के कारण उन्हें शारीरिक प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है. इसमें कहा गया है कि भारत में दलितों को राहत देने के अनुरोध की प्रशासन ने अनदेखी की. थाइलैंड में भी इसी तरह की घटना सामने आई. एक्शन एड् के प्रमुख कार्यकारी रमेश सिंह का कहना था कि इसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है. |
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