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सोमवार, 26 दिसंबर, 2005 को 09:40 GMT तक के समाचार
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राहत कार्यों में स्थानीय ज़रूरतों की उपेक्षा
सुनामी प्रभावित क्षेत्र
लोगों को कई ऐसी चीज़ें दी गई हैं जिनकी उन्हें ज़रूरत ही नहीं थी.
26 दिसंबर 2004 को भारत के अंडमान निकोबार द्वीप समूह में सूनामी लहरों के शिकार हुए लगभग दस हज़ार परिवारों के लिए अपना घर एक सपना होकर रह गया है. सूनामी लहरों से तबाह होने के एक साल बाद भी वे अस्थाई शिविरों में रह रहे है.

निकोबारी जनजातीय संघ के राशिद यूसुफ़ का कहना है, "हम लकड़ी और बाँस से अपने पंरपरागत घर बनाना चाहते थे, जिनमें हम सदियों से रहते आए हैं. हम केवल औज़ार और गिरे हुए पेड़ों की लकड़ी चाह रहे थे लेकिन सरकार ने अपनी चीज़ें हम पर थोप दी हैं."

सरकार ने अंडमान निकोबार द्वीप समूह में सूनामी लहरों से तबाह हुए लोगों को फिर से बसाने के लिए दो चरणों की एक विस्तृत योजना तैयार की थी.

पहले चरण में मानसून से पहले टीन के बने दस हज़ार अस्थाई शिविर बनाए गए थे. अब स्थाई आवास बनाने की योजना को अंतिम रुप देने की कोशिश की जा रही है, लेकिन अभी यह दूर की बात लगती है.

अंडमान निकोबार प्रशासन के मुख्य सचिव डीएस नेगी का कहना है कि मकानों के डिज़ाइन पर एक राय न होने के कारण ही देर हो रही है.

उनका कहना है कि स्थानीय जनजातीय लोगों और ग़ैर जनजातीय निवासियों की राय जानने के लिए कई तरह के डिज़ाइन सामने रखे गए हैं और हम ऐसे मकान बनाना चाहते हैं जिन पर सभी की सहमति हो.

तपते मकान

मुख्य सचिव का कहना है कि धातु के पहले से बने ढाँचें के स्थाई घर बनाने की प्रारंभिक योजना पर स्थानीय ग़ैर सरकारी संगठनों ने आपत्ति जताई थी. इसलिए स्थानीय तौर पर उपलब्ध बाँस और लकड़ी के अधिकतम इस्तेमाल से बनने वाले घरों के डिज़ाइन पर नए सिरे से काम शुरू किया गया.

सूनामी लहरों से प्रभावित लोगों के लिए टीन और धातु से बने अस्थाई शिविर अंडमान के गर्म और उमस भरे मौसम में भट्ठी की तरह तपने लगते है.

 हम लकड़ी और बाँस से अपने पंरपरागत घर बनाना चाहते थे, जिनमें हम सदियों से रहते आए हैं. हम केवल औज़ार और गिरे हुए पेड़ों की लकड़ी चाह रहे थे लेकिन सरकार ने अपनी चीज़ें हम पर थोप दी हैं
राशिद यूसुफ़, निकोबारी जनजातीय संघ के कार्यकर्ता

अंडमान और निकोबार पारिस्थितिकी परिषद के अध्यक्ष समीर आचार्य का कहना है कि यदि स्थाई आवासों के निर्माण में भी इसी सामग्री का इस्तेमाल किया गया तो ये लोग उन घरों में नहीं रह पाएंगें. यह परिषद पर्यावरण और स्थानीय लोगों के मुद्दों पर काम करने वाली द्वीप की सबसे बड़ी गैर सरकारी संस्था है.

समीर आचार्य का कहना है कि यदि धातु के इस्तेमाल से मकानों को बनाया गया तो जनजातीय लोगों को इनमें अपने सुअरों को रखना पड़ेगा और रात को जगंलों में जा कर सोना पड़ेगा.

प्रशासन ने अब लोगों और इन संगठनों की बात पर ध्यान देना शुरू किया है.

मुख्य सचिव डीएस नेगी का कहना है कि अब स्थाई आवास का बाहरी ढाँचा लोहे का होगा, जबकि दीवारों और दूसरी जगहों के लिए बाँस और लकड़ी का इस्तेमाल किया जाएगा.

जानकारी की उपेक्षा

लेकिन प्रश्न यह है कि स्थानीय प्रशासन और दिल्ली से आए विशेषज्ञों ने धातु के पहले से बने ढाँचे के इस्तेमाल से मकान बनाने पर ज़ोर क्यों दिया?

अंडमान के एक विशेषज्ञ मधुश्री मुखर्जी का कहना है कि अंडमान द्वीप समूह में प्रशासन उच्चाधिकारियों के आदेश पर चलता है और फिर से बसाने का काम ऐसा है जहाँ बहुत पैसा बनाया जा सकता है.

पूरा द्वीप समूह सहायता की ग़लत प्राथमिकताओं, भारत सरकार और ग़ैरसरकारी संगठनों द्वारा स्थानीय लोगों की भावनाओं और ज़रूरतों का आदर न करने व लोगों द्वारा सहायता सामग्री को ठुकराने की कहानियों से पटा पड़ा है.

इस वर्ष विश्व के अनेक ग़ैरसरकारी सगंठनों की ओर से निकोबारी महिलाओं के लिए सैनेटरी नेपकिन बाँटे गए थे.

एक वरिष्ठ जनजातीय महिला नेता आयशा माजिद का कहना है कि हमारी महिलाएँ इनका इस्तेमाल नहीं करतीं है इसलिए पहले तो पानी की कमी के कारण इनका इस्तेमाल टायलेट पेपर की तरह किया गया और फिर बाद में इनसे तकिए बना लिए गए.

स्थानीय प्रशासन की ओर से सूनामी पीड़ित प्रत्येक परिवार को एक हज़ार मीटर नायलॉन की रस्सी भी दी गई जबकि इन परिवारों को इसकी कोई ज़रुरत नहीं थी.

सहायता राशि का दुरपयोग

सूनामी की लहरों से सबसे अधिक प्रभावित निकोबार द्वीपों के लोगों का कहना है कि बड़ी संख्या में जीपें और मोटरसाइकिलें यहाँ भेजी गईं जबकि कोई पैट्रोल पंप न होने की वजह से यह किसी भी काम नहीं आ सकीं.

सूनामी प्रभावित
कई लोगों को अभी तक उनके सिरों पर छत नहीं मिल सकी है.

इसके अलावा हज़ारों की संख्या में भेजी गईं साइकिलें भी बेकार साबित हुईं क्योंकि इस क्षेत्र में बहुत ही कम सड़कें हैं.

राशिद यूसुफ़ का कहना है कि हमें नावों और डोंगियों की ज़रूरत थी जो पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं कराई गईं और जो नावें भेजी गईं हम उन्हें चलाने के अभ्यस्त नहीं हैं.

निकोबारी लोग विशेष तरह की डोंगियों का इस्तेमाल करते हैं जो कि भारत के अन्य राज्यों में मछुआरों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली नावों से अलग होती हैं.

समीर आचार्य का कहना है कि पाँच लाख की आबादी वाले अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में राहत और पुनर्वास के काम के लिए निर्धारित एक अरब रुपए की राशि में से अधिकांश रकम बेकार की राहत सामग्री में ही ख़र्च कर दी गई.

उनका कहना है कि राहत की अधिकांश रकम मुख्य भूमि के बड़े ठेकेदारों की जेब मे चली गई है जिन्होंने भारी मुनाफ़ा कमाया है.

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