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तबाही का वो दिल दहला देने वाला दृश्य | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कहते हैं मारने वाले से बचाने वाला ज़्यादा बड़ा होता है- अंडमान निकोबार द्वीप समूह में सूनामी से बाल-बाल बचने पर मन में बार-बार यही ख़्याल आता है. क्रिसमस और नए वर्ष की छुट्टी मनाने के लिए जब हमने अंडमान जाने का इरादा किया तो सभी ने हमसे एक ही बात कही-"आप कितनी खुशकिस्मत हैं? इन द्वीपों की ख़ूबसूरती के चर्चे तो दुनिया भर में है." और मैंने भी सोचा कि हम भी दिल्ली की कड़ाके की सर्दी और कोहरे से कम से कम दस दिनों के लिए तो बच जाएँगे. मगर ये किसे मालूम था कि अंडमान में सूनामी नाम का कहर आने वाला है. दिल दहलाने वाला दृश्य 26 दिसंबर की सुबह साढ़े 6 बजे हम सब दोस्तों के साथ पोर्ट ब्लेयर में फोनेक्स समुद्र तट जेट्टी पहुँचे यहाँ हम सवार हुए एम वी रामानुजन नाम के जहाज पर. ये जहाज जा रहा था हेवलॉक द्वीप जहाँ का राधानगर समुद्र तट दुनिया के सबसे खूबसूरत समुद्री तटों में से एक माना जाता है. अभी हमारे जहाज़ का सफर शुरू हुए सिर्फ़ दो-तीन मिनट ही हुए थे कि फोनेक्स समुद्र तट की एक जेट्टी टुकड़ों में टूटकर पानी में विलीन हो गई. मैं आँखे फ़ाड़े ये दिल दहला देने वाला दृश्य देखती रही, वॉच टॉवर को डूबने में एक सेकेंड भी नहीं लगा. बिजली का खंभा जो उससे कई गुना ऊँचा था वो भी चंद क्षणों में आँखों से ओझल हो गया गनीमत थी कि उस वक्त इस जेट्टी पर कोई भी नहीं था, इसलिए यहाँ कोई हताहत नहीं हुआ. अगले छह घंटे तक मुझे इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं था कि हालात कितने गंभीर थे. जब रामानुजन हेवलॉक पहुँचा तो उसे ये कहकर वापस भेज दिया गया कि वहाँ जेट्टी को काफी नुकसान पहुँचा है और पूरा समुद्र तट भी पानी से भरा है. जब मैं दो बजे के करीब पोर्ट ब्लेयर वापस पहुँची तब मुझे पता चला कि हालात कितने खराब हैं. गाँव उजड़े अगले कुछ दिनों में मैंने देखी और सुनी दिल को दहला देने वाली खबरें -हज़ारों की संख्या में लोग बेघर हो गए, उनके जीवन भर की मेहनत की कमाई मिनटों में नष्ट हो गए, माँओं की गोद से बच्चे छिन गए और नादान बच्चों के सर से पिता का साया उठ गया.
समुद्र की लहरों ने पूरे-पूरे गाँव तितर-बितर कर दिए. हज़ारों की तादाद में अंडमान और निकोबार के निवासी अपने ही देश में शरणार्थियों की तरह रहने के लिए मजबूर हो गए. हज़ारों महिलाओं और बच्चों को कारनिकोबार, कामपेल बे और हूट बे जैसी जगहों से लाकर पोर्ट ब्लेयर के राहत शिविरों में रखा गया. जान बचने की इस लोगों को खुशी थी, मगर इनके मन में सैकड़ों सवाल थे -भविष्य कैसा होगा? क्या इन्हें सरकार की तरफ से कोई मुआवज़ा मिलेगा? इनके परिवार और गाँव के बाकी सदस्य कहाँ हैं? और भूकंप के लगातार झटके और रोज़ की अफ़वाहें कि पानी अभी और ऊपर चढ़ रहा है-यहाँ के लोगों की दिन की नींद और रातों का चैन हराम कर चुका था. उम्मीद और शिकायतें और ऐसी गंभीर स्थिति में लोग उम्मीद कर रहे थे कि उन्हें कोई सहायता, कोई आश्वासन मिलेगा इस द्वीप समूह की सरकार से. मगर ऐसा नहीं हुआ. बार-बार राहत शिविरों में मुझे एक ही शिकायत सुनने को मिलती- खाना, कपड़ा और ज़रूरत की चीज़े तो गैर-सरकारी संगठन और पोर्ट ब्लेयर की जनता की तरफ़ से मिल रही हैं. सरकार की तरफ़ से हमें कुछ भी नहीं मिला.
और एक तरफ़ जहाँ सरकारी अफ़सर हमसे बार-बार कहते कि उन्हें बाहरी एजेंसी से मदद लेने की ज़रूरत नहीं है, उनके पास राहत सामग्री काफ़ी है, उसी तरफ़ कई द्वीपों से पोर्ट ब्लेयर लाए गए लोग बताते कि इन जगहों पर हालात कितने ख़राब हैं और वहाँ खाने और पानी की कितनी कमी है. और बहुत से लोगों का यहाँ मानना है कि सरकार जानबूझकर मृतकों की संख्या कम बता रही है- कार निकोबार का वायु सैनिक ठिकाना जो पूरी तरह इस सूनामी में नष्ट हो गया-सरकार के मुताबिक यहाँ सिर्फ़ सौ लोगों की मौत हुई है. मगर वहाँ काम करने वालों ने मुझे बताया कि वहाँ कम से कम 15 से 16 सौ लोग उस वक्त मौजूद थे. इनमें से ज़्यादातर लोग भारत की मुख्यभूमि से आए थे और इनका यहाँ कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता. बहुत से लोगों का मानना है कि शायद मृतकों की सही संख्या का कभी पता नहीं चल पाएगा-बहुत से शव अभी भी अपने घरों के मलबे में या जंगलों में दबे बड़े हैं और बहुत सी लाशें सागर के गर्भ में समा गई हैं. अब यहाँ के लोगों के पास बची हैं तो सिर्फ कुछ यादें-उन दिनों की जब समुद्र उनका दोस्त हुआ करता था और अंडमान निकोबार को दुनिया के सबसे खूबसूरत स्थानों में माना जाता था. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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