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शुक्रवार, 06 जनवरी, 2006 को 05:16 GMT तक के समाचार
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शेरॉन कोमा में, हालत में कोई सुधार नहीं
अरियल शेरॉन
सात घंटे तक शेरॉन का ऑपरेशन चला
इसराइल में हमादा अस्पताल के एक प्रवक्ता ने कहा है कि प्रधानमंत्री अरियल शेरॉन की स्थिति में सारी रात कोई सुधार नहीं हुआ. वे कोमा में हैं.

प्रवक्ता ने कहा कि जीवन के लिए ज़रूरी उनके सभी अंगों की स्थिति स्थिर है जो एक सकारात्मक संकेत है.

इससे पहले कहा गया था कि शेरॉन के स्वास्थ्य पर अभी लगभग 72 घंटे तक पल-पल-पल नज़र रखी जाएगी.

बुधवार को दिमाग़ की नस फटने के बाद से उनकी लगातार चिकित्सा जारी है लेकिन वे अभी भी जीवन की लड़ाई लड़ रहे हैं.

यरूशलम में हदासा अस्पताल के चिकित्सकों ने कहा है कि 77 वर्षीय शेरॉन को लगभग 72 घंटों तक कोमा में रखा जाएगा.

इससे पहले शेरॉन के मस्तिष्क में रक्तस्राव रोकने के लिए बुधवार रात सात घंटे तक ऑपरेशन चला था.

हदासा अस्पताल के निदेशक श्लोमो मोर योसेफ़ ने कहा है कि अभी भी प्रधानमंत्री शेरॉन अचेत हैं और उनके मस्तिष्क का दबाव कम करने के लिए उन्हें साँस लेने वाली मशीन पर रखा गया है.

उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया लंबी है और डॉक्टर कम से कम 48 घंटे बाद ही 77 वर्षीय शेरॉन को होश में लाने की कोशिश करेंगे.

शेरॉन को तबीयत बिगड़ने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था. येरूशलम के हदासा अस्पताल के निदेशक प्रधानमंत्री शेरॉन अभी कम से कम 24 घंटे तक साँस लेने वाली मशीन पर रखा जाएगा.

इसराइल के उप प्रधानमंत्री और शेरॉन के क़रीबी माने जाने वाले एहुद ओलमर्ट ने कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में काम संभाल लिया है. गुरुवार को उन्होंने एक आपात बैठक भी की.

ओलमर्ट ने कहा कि मंत्रिमंडल के सदस्य शेरॉन के स्वास्थ्य में सुधार के लिए प्रार्थना कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि यह कठिन समय है.

प्रतिक्रिया

इस बीच फ़लस्तीनी अधिकारियों ने बताया है कि उनके नेता महमूद अब्बास ने अरियल शेरॉन के दफ़्तर से संपर्क कर उनके स्वास्थ्य के प्रति अपनी चिंता व्यक्त की है.

मुख्य फ़लस्तीनी वार्ताकार साएब एराकात ने कहा है कि उन्हें फ़लस्तीनियों के प्रति इसराइल के संभावित रुख़ को लेकर चिंता है.

दूसरी ओर फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास ने कहा है कि दुनिया अपने सबसे बुरे नेताओं में से एक से छुटकारा पाने के क़गार पर है.

काहिरा से बीबीसी संवाददाता का कहना है कि अरब लोगों में शेरॉन के प्रति सबसे ज़्यादा घृणा है जो उन्हें 1982 में लेबनान के साबरा और चैतिला शरणार्थी शिविर में फ़लस्तीनियों के संहार का दोषी मानते हैं.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि अरब सरकारों में इस बात को लेकर चिंता भी है कि शेरॉन के प्रधानमंत्री पद पर न रहने और बिन्यामिन नेतन्याहू के सत्ता में आने से मध्य पूर्व में शांति प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है.

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