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जलवायु परिवर्तन पर सम्मेलन में सहमति | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जलवायु परिवर्तन पर हो रहे सम्मेलन में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने को लेकर क़दमों पर दीर्घकालिक बातचीत के लिए सहमति हो गई है. कनाडा के मॉन्ट्रियल में हो रहे इस सम्मेलन में अमरीका के रुख़ में बदलाव के कारण समझौते की उम्मीद बँधी और फिर अमरीका इसके लिए तैयार भी हो गया. कनाडा के प्रधानमंत्री के बयान से नाराज़ अमरीका ने पहले तो ये घोषणा कर दी थी कि वह इस मामले पर भविष्य में होने वाली किसी बातचीत में शामिल नहीं होगा. लेकिन बाद में उसने अपना रुख़ थोड़ा नरम किया है. अमरीका के नकारात्मक रुख़ की पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भी कड़ी निंदा की थी और अमरीकी मीडिया में भी इस पर आलोचनात्मक ख़बरे छपी थी. अब अमरीका ने कहा है कि वह भविष्य में होने वाली बातचीत में शामिल होगा लेकिन उसका ये भी कहना है कि वह ग्रीन हाउस गैसों में कटौती की कोई सीमा तय करने को नहीं मानेगा. समझौता सम्मेलन के अंतिम दिन क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर कर चुके देशों ने फैसला किया कि इसकी समय सीमा 2012 से आगे कर दी जाए. इसके अलावा अमरीका समेत अन्य देशों के बीच इस बात पर भी सहमति हुई कि धरती का तापमान कम करने के उपायों के बारे में आगे बातचीत जारी रहे जिसमें किसी प्रकार की प्रतिबद्धता का सवाल न हो. अमरीका ने ऐसी किसी भी बातचीत में शामिल होने से इंकार किया था जिसमें उसे गैस उत्सर्जन संबंधी किसी प्रतिबद्धता की बात हो. भविष्य की वार्ताओं में अमरीका के शामिल होने को सम्मेलन की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है लेकिन अमरीका ऐसे ही नहीं माना है. समझौते से कुछ ही घंटे पहले पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने अमरीकी रुख की कड़ी आलोचना करते हुए कहा था कि अमरीका के इस रुख से अमरीकी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुँचेगा. सात साल पहले क्लिंटन के कार्यकाल के दौरान ही अमरीका ने क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए थे. उन्होंने कहा, "अगर हम गंभीरता से प्रयास करें और भारी पैमाने पर फिलहाल उपलब्ध स्वच्छ तकनीक का प्रयोग करें तो हम क्योटो में तय किए गए लक्ष्य आसानी से पूरे कर सकते हैं. इससे हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत होगी. मैं यही बात कहने यहाँ तक आया था." इतना ही नहीं अमरीकी रुख की अमरीकी अख़बारों में भी कड़ी आलोचना हुई थी. शायद इन्हीं दबावों के बीच अमरीकी प्रतिनिधिमंडल आगे बातचीत के लिए तैयार हुआ है. अब ये समझौता हो गया है जिसके तहत 2012 के बाद गैस उत्सर्जन संबंधी निश्चित लक्ष्यों पर औपचारिक बातचीत शुरू होगी. लक्ष्य क्योटो के तहत अपने लक्ष्यों को पूरा कर पाने में मुश्किलों का सामना कर रहे औद्योगिक देश अब 2012 से पहले नए लक्ष्य तय कर सकेंगे.
यह समझौता व्यवसायिक समुदाय के लिए भी महत्वपूर्ण होगा जिन्होंने गैस उत्सर्जन संबंधी क्रेडिट की खरीद बिक्री शुरु कर दी थी. क्रेडिट की ख़रीद-बिक्री से तात्पर्य यह है कि अगर कोई देश अपने तय उत्सर्जन से अधिक गैस निकाल रहा है तो वह ऐसे किसी देश से क्रेडिट खरीद सकता है जो अपने तय उत्सर्जन से कम गैस निकाल रहा है. इस मामले में आगे होने वाली बातचीत में भारत और चीन की भूमिका पर भी चर्चा होगी क्योंकि इन देशों में हो रही आर्थिक प्रगति से भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसें वायुमंडल में जा रही हैं. समझौते के तहत ऐसे देशों के लिए जिन्होंने क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं या प्रोटोकॉल मानने को बाध्य नहीं हैं, उनके लिए दो साल तक वर्कशाप का आयोजन किया जाएगा. ताकि ये पता लगाया जा सके वो किस तरह आने वाले वर्षों में काम करें. ऐसे देशों में भारत और चीन के अलावा अमरीका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देख हैं. मांट्रियल में हुए इस समझौते से पर्यावरणवादी खुश हैं. सम्मेलन स्थल के बाहर खड़े एक पर्यावरणवादी ने कहा, "मुझे लगता है कि ये समझौता ऐतिहासिक सिद्ध होगा जहाँ सही मायने में विभिन्न देश जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रतिबद्ध हो रहे हैं. उन्होंने कहा कि ये फैसला कितना महत्वपूर्ण होगा ये आने वाले दो वर्षों या फिर 2012 में ही पता चलेगा. | इससे जुड़ी ख़बरें दुबई के रेगिस्तान में बर्फ़ ही बर्फ़04 दिसंबर, 2005 | मनोरंजन पर्यावरणवादियों के विश्वव्यापी प्रदर्शन03 दिसंबर, 2005 | पहला पन्ना सम्मेलन में अमरीका की आलोचना28 नवंबर, 2005 | पहला पन्ना जलवायु परिवर्तन पर समझौता28 जुलाई, 2005 | विज्ञान हिमालय के लिए हिलेरी की अपील10 जुलाई, 2005 | विज्ञान 'ग्लोबल वॉर्मिंग' बहस में नया मोड़04 जुलाई, 2005 | पहला पन्ना इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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