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इराक़ में शिया समुदाय में झड़पें क्यों? | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इराक़ के शिया नेता मुक़्तदा अल सद्र ने अपने समर्थकों और प्रतिद्वंद्वी शिया गुटों के बीच हुए संघर्ष के बाद शांति बनाए रखने का आहवान किया है. इराक़ में नए संविधान के मसौदे पर हो रहे गहन विचार-विमर्श की पृष्ठभूमि में ये झड़पें हुई हैं. बीबीसी के मध्य पूर्व मामलों के जानकार रोजर हार्डी का कहना है कि शिया समुदाय के दो गुटों के बीच यह संघर्ष बहुत संवेदनशील समय में हुआ है जब संविधान के मसौदे पर संसदीय वोट का इंतज़ार किया जा रहा है. संविधान के मसौदे ने देश के शिया, सुन्नी और कुर्द समुदायों में पहले से ही बहुत तल्ख़ियाँ पैदा कर दी हैं. सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाए जाने के बाद से ही शिया समुदाय में प्रभुत्व के लिए खींचतान चल रही है लेकिन संविधान के मुद्दे ने इस और मुखर और संवेदनशील बना दिया है. शियाओं के एक प्रमुख धार्मिक दल - सुप्रीम काउंसिल फ़ॉर इस्लामिक रिवोल्यूशन इन इराक़ ने संघीय व्यवस्था में एक ऐसा क्षेत्र बनाए जाने की हिमायत की है जहाँ शियाओं का शासन हो. इस काउंसिल को ईरान का समर्थन हासिल है. लेकिन युवा शिया नेता मुक़्तदा अल सद्र इस विचार का प्रबल विरोध करते हैं और उन्होंने इस मुद्दे पर सुनियों से हाथ मिला लिया है. सुन्नी नेताओं का कहना है कि संघीय व्यवस्था बनाने से देश विभाजन की तरफ़ बढ़ेगा. ऐसा लगता है कि नजफ़ में मुक़्तदा अल सद्र का दफ़्तर फिर से खोले जाने के फ़ैसले के बाद सद्र के समर्थकों और विरोधी गुट के बीच संघर्ष हुआ. बीबीसी संवाददाता रोज़र हार्डी का कहना है कि हो सकता है कि सद्र ने राजनीतिक स्थिति की संवेदनशीलता को भाँपकर ही अपना दफ़्तर नजफ़ में फिर से खोलने का फ़ैसला किया हो ताकि उन्हें राजनीतिक क्षेत्र में पर्याप्त महत्व मिल सके. लेकिन ईरान समर्थित शिया काउंसिल ने इस क़दम को एक अप्रिय चुनौती के रूप में देखा. शिया समुदाय में हुई इन झड़पों से प्रधानमंत्री इब्राहीम जाफ़री सहित सभी शिया नेता परेशान हैं और वे शांति बनाए रखने की अपील कर रहे हैं. |
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