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संविधान पर सहमति बन पाएगी: जाफ़री
जाफ़री
सबसे ज़्यादा मतभेद है संघीय ढ़ाँचे पर
इराक़ के प्रधानमंत्री इब्राहिम अल जाफ़री ने कहा है कि उन्हें पूरा विश्वास है कि तीन दिन के भीतर नए संविधान पर सहमति बन पाएगी.

उनकी टिप्पणी तब आई है जब राजनीतिक नेताओं ने संसद को नए संविधान का मसौदा तो सौंप दिया लेकिन उस पर मतदान नहीं किया.

ऐसा इसलिए कि कई अहम मुद्दों को सुलझाया जाना बाक़ी है.

राजनीतिक नेताओं को संघीय व्यवस्था पर मतभेद सुलझाने हैं क्योंकि सुन्नी नेताओं का मानना है कि इससे इराक़ का विभाजन हो सकता है.

इससे पहले संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष का कहना था कि उन्हें नहीं लगता कि तीन दिन में राजनीतिक नेता मतभेद सुलझा पाएँगे.

असहमति के मुद्दे

इराक़ी संसद के स्पीकर हाशिम अल हसनी ने बैठक में कहा कि उन्हें देश के संविधान का मसौदा मिल गया है लेकिन अभी कई मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी है.

तेल संसाधन
तेल के बटवारे को लेकर सुन्नी समुदाय की अपनी चिंताएँ हैं

इनमें संघीय ढाँचा, बाथ पार्टी पर प्रतिबंध, इस्लाम की भूमिका, सरकार, राष्ट्रपति और संसद के अधिकारों के मुद्दे अहम हैं.

पहले शिया नेताओं ने घोषणा कर दी थी कि उनकी कुर्दों के साथ सहमति बन चुकी है लेकिन सुन्नी नेताओं ने इस पर अपना ऐतराज़ जताया था.

सुन्नी मुसलमानों का कहना था कि अगर ये मसौदा लागू होता है तो इराक़ बिखर सकता है.

इस्लामी राष्ट्र

बीबीसी के मध्य पूर्व पर्यवेक्षक रॉजर हार्डी का कहना है कि सद्दाम हुसैन के शासनकाल में इराक़ धर्मनिरपेक्ष देश माना जा सकता था.

लेकिन यदि संविधान का प्रस्तावित मसौदा लागू किया जाता है तो देश में सत्ता का विकेंद्रीकरण तो होगा लेकिन उसकी पहचान काफ़ी हद तक इस्लामी राष्ट्र के रूप में हो जाएगी.

हार्डी के मुताबिक ये एक बड़ा परिवर्तन होगा और इसीलिए लोग इस पर उत्तेजित हो रहे हैं.

यहाँ तक शिया और कुर्द मुसलमानों का सवाल है, वे तो अतीत के साथ नाता तोड़ना चाहते हैं.

लेकिन कई सुन्नी और उदारवादी धर्मनिरपेक्ष शिया और कुर्द इसे लेकर चिंतित हैं.

शिया और सुन्नी मुसलमानो के बीच जिस तरह से पहले विवाह हो सकते थे, अब इन्हें लेकर समस्याएँ पैदा हो रही हैं.

देश के कई हिस्सों में अब स्त्रियाँ सिर ढके बिना सड़क पर नहीं चल सकती.

हार्डी के अनुसार देश के कई हिस्सों में कट्टरपंथी सुन्नी मुसलमान तालेबान की तरह का शासन चला रहे हैं.

इन परिस्थितियों में संविधान में सबके अधिकारों की बात होना अपनी जगह है लेकिन असल में सांप्रदायिकता, असहनशीलता और मतभेद व्यापक हैं.

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