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बुधवार, 17 अगस्त, 2005 को 17:01 GMT तक के समाचार
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घर लौटने की आस में लाखों शरणार्थी
फ़लस्तीनी
लाखों फ़लस्तीनी बेघर होने के बाद पड़ोसी देशो में रह रहे हैं
मध्य-पूर्व में 37 लाख से ज़्यादा फ़लस्तीनी शरणार्थी हैं और विश्व भर में लगभग 80 लाख.

और उन सबका एक ही स्वप्न है कि किस तरह वे अपने घर लौट सकें.

फ़लस्तीनियों का कहना है कि 1948 से वे अपने घरों से बेघर हो कर दुनिया भर में फैले हुए हैं और यह विश्व में शरणार्थियों की सबसे गंभीर समस्या है.

क्या कभी ये लोग उस ज़मीन पर लौट पाएँगे जिसे फ़लस्तीन का नाम दिया जाता था.

बिखराव

1947 में जो अरब-इसराइली युद्ध शुरू हुआ उसके कारण हज़ारों हज़ार फ़लस्तीनी अपने घर छोड़ कर भाग गए या उन्हें यहूदी सेनाओं ने खदेड़ दिया.

उस समय कितने लोग विस्थापित हुए, इसका सही अनुमान तो नहीं लगाया जा सकता है.

लेकिन संयुक्त राष्ट्र राहत एजेंसी ने यह संख्या लगभग दस लाख आँकी है.

समझा जाता है कि इनमें से एक-तिहाई लोग तो पश्चिमी तट चले गए, एक-तिहाई ग़ज़ा पट्टी और शेष जोर्डन, सीरिया, लेबनान और दुनिया भर में अन्य जगह.

दूसरा विस्थापन

वर्ष 1967 में अरब-इसराइली युद्ध की शुरूआत के बाद कुछ और फ़लस्तीनी विस्थापित हुए-कई तो दूसरी बार.

और जब इसराइल ने अपने क्षेत्र को विस्तार दिया तो लगभग तीन लाख फ़लस्तीनी पश्चिमी तट और ग़ज़ा से चले गए और उनमें से अधिकतर जॉर्डन में जाकर बस गए.

फ़लस्तीनी शरणार्थी
फ़लस्तीनी शरणार्थी मिस्र, सीरिया और जॉर्डन में बड़ी तादाद में हैं

फ़लस्तीनी दो कारणों से अपने वापसी के अधिकार की मांग कर रहे हैं- एक तो अपना नैतिक हक़ समझकर और दूसरे इस बारे में संयुक्त राष्ट्र ने कई प्रस्ताव पारित किए हैं.

इनमें से प्रमुख है दिसंबर,1948 में पारित महासभा का प्रस्ताव 194, जिसमें कहा गया है कि अपने घर लौटने और अपने पड़ोसियों के साथ शांति से रहने के इच्छुक फ़लस्तीनी शरणार्थियों को जल्द-से-जल्द ऐसा करने की अनुमति दी जाए.

इसराइल इसकी ज़िम्मेदारी लेने से इनकार करता रहा है और इस पर अड़ा हुआ है कि फ़लस्तीनी शरणार्थी और उनके वंशज कभी नहीं लौट सकते.

इसराइल के पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बराक ने हाल ही में परिवारों को एकजुट करने की योजना के तहत कुछ लोगों को वापस लाने की पेशकश की थी.

लेकिन बाद की इसराइली सरकारों ने केवल साठ लाख की आबादी वाले इस देश में लाखों अरबों को लौटा लाने की कोई कोशिश नहीं की शायद इस डर से कि वहाँ के यहूदी बहुमत का सफ़ाया न हो जाए.

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