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अराफ़ात के उत्तराधिकारी महमूद अब्बास | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
फ़लस्तीनी नेतृत्व की कमान संभालने वाले महमूद अब्बास के सामने अनेक चुनौतियाँ रही हैं लेकिन गज़ा पट्टी ख़ाली करने के इसराइली फ़ैसले से उन्हें थोड़ी राहत मिली है. नवंबर 2004 में फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात की मृत्यु के बाद महमूद अब्बास को फ़लस्तीनी मुक्ति संगठन यानी पीएलओ का अध्यक्ष चुना गया था. और जनवरी में वे फ़लस्तीनी राष्ट्रपति चुनाव में बड़े अंतर से जीत गए. 69 वर्षीय महमूद अब्बास उदारवादी नेता माने जाते हैं. अब्बास को फ़लस्तीनियों के राजनीतिक गुट फ़तह का समर्थन प्राप्त थे और वे शुरू से ही दौड़ में सबसे आगे चल रहे थे. अब्बास को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ-साथ इसराइल का भी समर्थन हासिल था. जो इस पद पर किसी उदारवादी नेता की नियुक्ति चाह रहे थे. महमूद अब्बास मई 2003 में फ़लस्तीनी प्रशासन के प्रधानमंत्री बने थे लेकिन चार महीने बाद ही उन्होंने इस पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. संघर्ष महमूद अब्बास का जन्म 1935 में ब्रितानी उपनिवेश रहे फ़लस्तीन के साफ़ेद नगर में हुआ था.
अब्बास पीएलओ के प्रमुख राजनीतिक गुट फ़तह के जीवित बचे संस्थापक सदस्यों में से एक हैं. 1950 के दशक में निर्वासित होकर क़तर में रह रहे अब्बास ने फ़लस्तीनियों के संघर्ष के लिए एक संगठन तैयार किया. जिसके सदस्य बाद में पीएलओ के प्रमुख सदस्य बने. उसके बाद अब्बास ने यासिर अराफ़ात के साथ मिलकर फ़तह का गठन किया और निर्वासन के दौरान उनके साथ जॉर्डन, लेबनॉन और ट्यूनिशिया में रहे. वे अपने साफ़-सुथरे और सरल जीवन के कारण संगठन के कार्यकर्ताओं के बीच काफ़ी सम्मानित थे. महमूद अब्बास ने पढ़ाई-लिखाई भी खूब की है. उन्होंने मिस्र में क़ानून की शिक्षा पाने के बाद मॉस्को में पीएचडी की. उन्होने कई क़िताबें भी लिखी हैं. नेटवर्क महमूद अब्बास को हमेशा पृष्ठभूमि में ही रखा गया लेकिन उन्होंने ख़ुफ़िया सेवाओं और अरब नेताओं के साथ अच्छे संबंध बना लिए. इसी कारण 1970 के दशक में उन्हें पीएलओ के लिए कोष जुटाने और सुरक्षा मामलों का ज़िम्मा भी सौंपा गया जिसे उन्होंने सफलतापूर्वक निभाया.
1980 में उन्हें पीएलओ के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग का प्रमुख भी नियुक्त किया गया था. महमूद अब्बास को एक व्यवहारिक व्यक्ति माना जाता है. उन्हें इसराइली वामपंथियों के साथ बातचीत शुरू करने की पहल करने वालों में प्रमुख व्यक्ति माना जाता है. ओस्लो शांति प्रक्रिया के पीछे उनकी बड़ी भूमिका मानी जाती है. ओस्लो शांति समझौते पर हस्ताक्षर के समय वे यासिर अराफ़ात के साथ व्हाइट हाउस में मौजूद थे. चुनौती अब्बास के सामने सबसे बड़ी चुनौती चरमपंथी संगठनों को काबू में रखने की है. उन्होंने हमास को काबू में करने की लगातार कोशिश की, गज़ा पट्टी से यहूदी बस्तियों को हटाने की इसराइली शर्त यही थी कि फ़लस्तीनी इलाक़े से गोलीबारी बंद हो. महमूद अब्बास ने चरमपंथी संगठनों से अपील की कि वे हमले करके गज़ा से यहूदियों की वापसी को ख़तरे में न डालें, उनकी अपील का कुछ हद तक असर भी हुआ. गज़ा पट्टी से यहूदियों की वापसी का कुछ हद तक श्रेय मिलने के बाद महमूद अब्बास की स्थिति थोड़ी मज़बूत ज़रूर हुई है लेकिन उनकी चुनौतियाँ बरक़रार हैं. |
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