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शनिवार, 16 जुलाई, 2005 को 15:19 GMT तक के समाचार
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भारतीय मूल के व्यक्ति के नाम पर डाकखाना

कैलिफ़ोर्निया के डाकखाने
इसी डाकखाने का नाम दलीप सिंह सौंध के नाम पर रखा जा रहा है
अमरीका में पहली बार किसी भारतीय मूल के अमरीकी को यह सम्मान दिया गया है कि उसके नाम पर एक सरकारी इमारत का नाम रखा गया.

अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने अमरीकी संसद की सर्वसम्मति से पारित इस आशय के एक विधेयक पर इस हफ़्ते अपने हस्ताक्षर किए और केलिफोर्निया के टेमीकुला शहर के मुख्य डाकखाने का नाम अब दलीप सिंह सौंध डाकखाना हो गया है.

दलीप सिंह सौंध 1957 में कैलिफोर्निया के रिवरसाईड के 29वें संसदीय क्षेत्र से डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार की हैसियत से अमरीकी संसद के निचले सदन के सदस्य चुने गए थे.

वह भारतीय मूल के ही नहीं बल्कि एशियाई मूल के भी पहले अमरीकी थे जो संसद के सदस्य चुने गए थे. वह लगातार तीन बार संसद के लिए चुने गए थे.

इतिहास

इस तरह अमरीका मे दक्षिण एशियाई मूल के लोगों को प्रतिनिधित्व प्रदान करने का इंतज़ाम उस वक़्त भी हो चुका था जब अमरीका में उनकी संख्या बहुत कम थी. 1950 के दशक के अमरीका में रंग और नस्ल का भेदभाव चरम पर था.

 दलीप सिंह सौंध की कहानी पक्के इरादे और कड़ी मेहनत से हासिल की गई सच्ची सफलता की कहानी है. भारतीय मूल के अमरीकीयों के लिए यह बेहद खुशी का मौक़ा है
बॉबी जिंदल, रिपब्लिकन सांसद

कैलिफोर्निया के जिस संसदीय क्षेत्र से दलीप सिंह सौंध ने चुनाव जीता था वहाँ एशियाई लोगों की संख्या न के बराबर थी. लेकिन अपनी क़ाबलियत और निष्ठा के बल पर दलीप सिंह सौंध ने वह कर दिखाया था जो उस समय अमरीका में एक अजूबा बात थी.

इस सम्मान से गौरवान्वित महसूस करते हुए दलीप सिंह सौंध के पोते एरिक सौंध कहते हैं, “मेरे दादा दलीप सिंह सौंध को इस तरह सम्मानित किए जाने से मुझे बहुत गर्व महसूस हो रहा है. उन्होंने कड़ी मेहनत और सच्ची निष्ठा से जो कुछ हासिल किया उससे मिसाल कायम हुई और उन्होने जनतंत्र का फ़ायदा खुद भी उठाया और दूसरों को भी फ़ायदा पहुँचाया.”

सौंध
सौंध पढ़ाई करने कैलिफ़ोर्निया पहुँचे थे

1920 में भारत के पंजाब राज्य के अमृतसर के छज्जुलवादी गाँव से दलीप सिंह सौंध अपनी पढ़ाई के सिलसिले में कैलिफोर्निया आए और यहीं के होकर रह गए. पढ़ाई के साथ उन्होने खर्च चलाने के लिए खेतों में काम भी किया. पहले 30 साल तक उन्होंने किसानी की. साथ में सौंध ने गणित में पीएच डी की अपनी पढ़ाई पूरी कर ली.

इस दौरान वह अमरीकी समाज में भारतीयों के खिलाफ़ उस समय होने वाले भेदभाव के विरूद्ध भी आवाज़ बुलंद करते रहे. अमरीकी कानून के तहत उस समय भारतीय मूल के लोगों को अमरीकी नागरिकता भी नहीं दी जाती थी. लेकिन सौंध जैसे भारतीयों ने हार नहीं मानी.

इस बीच उन्होंने एक श्वेत अमरीकी महिला मारियान से शादी कर ली. 1949 में कानून में संशोधन के बाद अन्य भारतीयों के साथ सौंध को भी अमरीकी नागरिकता मिल गई. इसके बाद वह न्यायाधीश के ओहदे के लिए चुने गए.

अब कोई पचास साल बाद 2005 में अमरीकी संसद में सौंध को सम्मानित करने हेतु विधेयक को पेश करते हुए कैलिफोर्निया के एक सदस्य डेरल ईसा ने कहा, “इस कानून को पारित करके हम दलीप सिंह सौंध की याद क़ायम रखेंगे और भारत से आने वाले सभी आप्रवासियों की कामयाबी को सम्मानित करेंगे.”

ख़ुशी

इस मौक़े पर अमरीकी इतिहास में सौंध के बाद संसद के लिए पिछले वर्ष चुने जाने वाले दूसरे भारतीय मूल के अमरीकी बॉबी जिंदल ने कहा, “दलीप सिंह सौंध की कहानी पक्के इरादे और कड़ी मेहनत से हासिल की गई सच्ची सफलता की कहानी है. भारतीय मूल के अमरीकीयों के लिए यह बेहद खुशी का मौक़ा है.”

1962 में सौंध अपने चौथे चुनाव के प्रचार में लगे थे जब उन्हें लकवा मार गया. हॉलीवुड स्थित घर में अपनी पत्नी, बच्चों और पोते-पोतियों के साथ उन्होंने बाक़ी के दिन गुज़ारे और 1973 में दलीप सिंह सौंध का देहांत हो गया.

लेकिन आज भी अमरीका में रहने वाले लाखों भारतीयों को दलीप सिंह सौंध की कहानी मेहनत के ज़रिए सफलता हासिल करने के लिए प्रेरित कर रही है.

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