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गुरुवार, 14 जुलाई, 2005 को 20:21 GMT तक के समाचार
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ब्रिटेन के बहुसंस्कृतिवाद पर उठे सवाल

सलमान रश्दी की क़िताब पर ख़ासा बवाल उठा था
सलमान रश्दी की क़िताब पर ख़ासा बवाल उठा था
क्या ब्रिटेन का बहुसंस्कृतिवाद सफल रहा है? लंदन में हुए हमले के बाद इस सवाल को लेकर बहस शुरू हो गई है.

कई शताब्दियों से मुस्लिम समुदाय ब्रिटेन में रहता आया है.

लेकिन हाल की कुछ घटनाओं के बाद ये विवाद के घेरे में आ गया है.

पिछले डेढ़ दशक में तीन बड़ी घटनाओं के चलते मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव बढ़ा है - 1980 के दशक में सलमान रश्दी मामला, सितंबर 2001 में अमरीका पर हुआ हमला और ब्रिटेन पर उसका असर और अब लंदन में हुए बम धमाके.

एक तरह से देखा जाए तो रश्दी मामला एक अहम मोड़ था.

उसके पहले ज़्यादातर ब्रितानी लोग ये नहीं जानते थे कि लीड्स और ब्रेडफोर्ड जैसे औद्योगिक शहरों में मुस्लिम समुदाय बड़ी संख्या में बस रहा है.

शायद इसीलिए ब्रेडफोर्ड में सलमान रश्दी की किताब को सार्वजनिक तौर पर जलाए जाने की घटना ने सबको चौंका दिया था.

इस पूरे घटनाक्रम ने रश्दी की किताब से आहत हुए मुसलमानों और इस मुद्दे पर उदारवादी विचार रखने वाले लोगों के बीच की खाई को सामने ला दिया.

युवा मुस्लिमों में रोष

दूसरे विश्व युद्ध के बाद बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग ब्रिटेन आए.

भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए ये लोग इंग्लैंड के कपड़ा उद्योग के लिए सस्ते दामों पर काम करने लगे.

शुरूआत में सिर्फ पुरुष ही आते थे जिनका इरादा पैसे कमाकर वापस जाना था.

लेकिन 1970 के दशक में इनमें से कई लोगों का परिवार भी ब्रिटेन आकर रहने लगा.

लंदन में हुए हमले के बाद ये मुद्दा फिर विवाद में आ गया है
लंदन में हुए हमले के बाद ये मुद्दा फिर उठा है

जब सलमान रश्दी का मामला उठा उस समय तक ये लोग अपने आप को आप्रवासी मुसलमानों के बजाय ब्रितानी मुस्लिम समझने लगे थे. लेकिन पहली पीढ़ी के साथ साथ युवा मुसलमानों पर रश्दी मामले का असर पड़ा.

फ़लस्तीन में हालात, 1991 में खाड़ी युद्ध और युगोस्लाविया में मुसलमानों की दशा ने मुस्लिम मत को और कट्टर बना दिया.

इसी समय ब्रिटेन के युवा मुसलमान बेरोज़गारी, अपराध और भेदभाव जैसे मुद्दों से जूझ रहे थे.

कई लोगों का मानना था कि धर्म और रंग के आधार पर उनके ख़िलाफ़ भेदभाव किया गया.

बदला माहौल

इसी सब के बीच अमरीका पर वर्ष 2001 में हमला किया गया. हमले के बाद चिंता जताई गई कि पश्चिमी देशों में रहने वाला मुसलमान युवक भी अल क़ायदा की हिंसा वाली विचारधारा से प्रभावित हो सकता है.

2004 में स्पेन में हुआ हमला और फिर लंदन में जुलाई मे हुए बम धमाके के बाद ये सवाल और भी अहम हो गया है.

लंदन में हुए बम धमाकों में ब्रिटेन के युवा मुसलमानों का हाथ होने की बात मुस्लिम नेताओं और ब्लेयर सरकार दोनों के लिए बड़ी चुनौती है.

मुस्लिम समुदाय के नेता और शिक्षक इस बात को लेकर दबाव में हैं कि क्या उन्होंने कट्टरवाद को रोकने के लिए उचित क़दम उठाए हैं.

इस घटना ने ब्रितानी नेताओं को 60 के दशक से अपनाई गई बहुसंस्कृतिवाद की नीति पर फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया है.

आलोचकों का कहना है कि बहुसंस्कृतिवाद का मक़सद विभिन्न समुदायों को एक साथ लाना था लेकिन इस नीति का असर उलटा ही हुआ है.

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