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शनिवार, 23 अप्रैल, 2005 को 22:41 GMT तक के समाचार
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सू ची के लिए अन्नान का आग्रह
आंग सान सू ची
लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू ची को बर्मा में उनके घर में नज़रबंद रखा गया है
संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफ़ी अन्नान ने बर्मा की सैनिक सरकार से आग्रह किया है कि वह लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू ची को रिहा करे ताकि वे बर्मा के नए संविधान को बनाने की प्रक्रिया में भाग ले सकें.

कोफ़ी अन्नान ने जकार्ता में एफ़्रो-एशियाई देशों के शिखर सम्मेलन के अवसर पर अलग से बर्मा के सैनिक नेता जनरल थान श्वे से मुलाक़ात की और बर्मा में लोकतंत्र की स्थापना के लिए जारी प्रयासों में तेज़ी लाने के लिए कहा.

बर्मा के नेता से मिलने के बाद कोफ़ी अन्नान ने पत्रकारों को बताया कि उन्होंने जनरल थान श्वे से कहा कि देश की संवैधानिक प्रक्रिया में देश के नागरिकों को भी शामिल किया जाना ज़रूरी है.

कोफ़ी अन्नान ने पत्रकारों से कहा,"मैं जनरल श्वे से मिला और हमने म्यामां तथा वहाँ की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बारे में बात की. उन्होंने व्यापक रूप से बताया कि वे इस बारे में क्या सोचते हैं और क्या हो रहा है. मैंने आंग सान सू ची की रिहाई की भी बात की".

नया संविधान

बर्मा के सैनिक शासकों ने हाल ही में देश में एक नए संविधान के निर्माण के लिए एक राष्ट्रीय सभा कराए जाने की बात की है.

जनरल थान श्वे
जनरल थान श्वे ने कोफ़ी अन्नान को लोकतंत्र बहाली के लिए जारी प्रयासों की जानकारी दी

मगर अभी तक उन्होंने विपक्षी नेता आंग सान सू ची की रिहाई के कोई संकेत नहीं दिए हैं.

आंग सान सू ची की उम्र 60 वर्ष होनेवाली है और उन्हें उनके घर में नज़रबंद रखा गया है और उन्हें स्वतंत्र पर्यवेक्षकों से मिलने की अनुमति नहीं है.

उनकी पार्टी, नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी, ने अपनी नेता की रिहाई के बिना संविधान निर्माण के लिए होनेवाली वार्ताओं में हिस्सा लेने से मना कर दिया है.

बढ़ता दबाव

बर्मा के सैनिक शासकों पर लोकतांत्रिक सुधारों और अपने मानवाधिकार रिकॉर्डों में सुधार के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता ही जा रहा है.

अगले वर्ष के अंत में दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन यानी आसियान की अध्यक्षता के लिए बर्मा की बारी आ रही है.

लेकिन अमरीका और यूरोपीय संघ ने धमकी है कि अगर बर्मा ने अपना रिकॉर्ड नहीं सुधारा तो वे आसियान की बैठक का बहिष्कार कर देंगे और साथ ही संगठन के लिए दिए जानेवाले विकास की राशि भी रोक देंगे.

मगर बर्मा में 1988 में सत्ता अपने हाथ में लेनेवाले सैनिक शासकों ने इसके पहले ना तो लोकतांत्रिक सुधार और ना ही आंग सान सू ची की रिहाई के बारे में किसी अंतरराष्ट्रीय अपील पर ध्यान दिया है.

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